मानव के बहुआयामी इतिहास में उन सभी आयामों के लिए पूरक होने के प्रमाण को मानव अपने कुल के लिए समर्पित नहीं कर पाया। इसी कारण अब प्रबुद्घ मानवों का यह दायित्व होता है कि सभी आयामों में जो रिक्त और अपेक्षित भाग है उसकी भरपाई कर देवें। उसमें से प्रथम और प्रमुख आयाम यही देखने को मिला-व्यवस्था और समग्र व्यवस्था मे भागीदारी। मानव जागृतिपूर्वक ही इसकी भरपाई कर पायेगा।
जागृति मानव की सर्वकालीन अपेक्षा और आवश्यकता है। अभी यह इस प्रकार से संभव हो गया कि-
अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित दर्शन विधि से मानव ही चिंतनशील एक मात्र इकाई हैं। चिंतन का मूल तत्व अथवा मूल वैभव जीवन सहज रूप में होने वाले जानने, मानने के रूप में और उसके तृप्ति बिंदु के रूप में है। यही मानव में दर्शन ज्ञान का वैभव है। सहअस्तित्व दर्शन ही परम दर्शन है क्योंकि सहअस्तित्व ही परम सत्य है और जीवन विद्या ही परम विद्या हैं। इसका साक्षात्कार करने का उपाय है। मानवीय आचरण ही मानव में, से, के लिए परम आचरण है क्योंकि मानव मानवत्व सहित ही अपने में व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदारी कर सकता है। इसकी आवश्यकता प्रत्येक व्यक्ति को है।
अस्तित्व सहज सहअस्तित्व में संपूर्ण प्रकृति को भौतिक-रासायनिक एवं चैतन्य रूप में मानव देख, समझ पाता है। चैतन्य रूप में जो जीवन देखने को मिल रहा है, इसे देखने वाला मानव ही है। दिखने वाली चीज मानव के लिए अध्ययनगम्य हो पाती है। जैसे- प्रत्येक मानव में चयन और आस्वादन, विश्लेषण और तुलन, चित्रण और चिंतन, संकल्प और बोध, प्रामाणिकता और अनुभव - ये दस क्रियाएँ जीवन सहज क्रियाएँ हैं। इनके प्रकाशन संप्रेषणा और अभिव्यक्ति क्रम में शरीर को जीवन्त माना जाता है। शरीर का जीवित रहना माना जाता है। इन क्रियाओं का अध्ययन प्रत्येक मानव में निरीक्षण-परीक्षण पूर्वक किया जा सकता है। इन दस क्रियाओं में, से कुछ क्रियाएँ व्यवहार में प्रमाणित रहती है। कुछ क्रियाएँ प्रमाणित नहीं रह पा रही हैं, यही मूलत: जीवन सहज अतृप्ति और समस्या है। फलत: अव्यवस्था ही हाथ लगती है। इसलिए अभी वर्तमान में कितनी क्रियाएँ व्यवहार में प्रमाणित होती है और व्यवहार में कितनी प्रमाणित नहीं हो पा रही है, इसका परिशीलन हम कर सकते हैं। और जितनी क्रियाएँ व्यवहार में प्रमाणित नहीं हो पा रही हैं उसको पहचान सकते हैं। इसके निराकरण के लिए उचित उपायों को प्राप्त कर सकते हैं। क्योंकि प्रत्येक मानव में जीवन सहज कल्पनाशीलता-कर्म स्वतंत्रता नित्य प्रभावी है। इसी आधार पर उपायों को खोजना प्रत्येक मानव में, से, के लिए सहज संभव है। प्रत्येक मानव जागृति पूर्वक जीवन सहज दस क्रियाकलापों को स्वयं में, स्वयं से, स्वयं के लिए पहचान सकता है और परस्परता में प्राप्त मानव को भी अध्ययन कर सकता है। परस्परता में प्राप्त मानव, स्वाभाविक रूप में प्राप्त परस्परता के साथ व्यवहार करता ही है। व्यवहार में