इसे हर व्यक्ति अपनी संतुष्टि के लिए अथवा निश्चयन के लिए सर्वेक्षित कर सकता है। इसी मानसिकता के क्रम में, भय पीड़ित अथवा प्रताड़ित मानसिकता ही सर्वप्रथम व्यक्त होने, करने, कराने का अवसर और आवश्यकता समीचीन रही है। इसका साक्ष्य आज भी हर भाषा में भय संबंधी कथन, कथा, परिकथा, तथा चर्चाओं के रूप में प्रकाशित होता हुआ दिखाई पड़ता है। साथ ही साथ अभयता की अपेक्षा हर पीढ़ी में रहती आयी है और हर पीढ़ी अभयता से परिपूर्ण होने में असमर्थ रहते ही आयी है। आदिमानव में एवं अत्याधुनिक मानव में इतना ही परिवर्तन दिखाई पड़ता है कि प्राकृतिक भय और पशुभय (क्रूर जानवरों का भय) का प्रभाव कम हो गया। जैसे जैसे ये भय कम हुए मानव में निहित अमानवीयता का भय पराकाष्ठा की ओर होना प्रकाशित हुआ। यहाँ उल्लेखनीय मुद्दा यही है कि युद्ध जैसे परम दुष्ट कृत्यों को विकास का आधार मान लेना, मनवा देना, अत्याधुनिक युग का दबाव और पीड़ा है।
क्रूरता, हिंसा और युद्ध मानसिकता :
आदिमानव में भी घटनाओं के साथ तदाकार होना, कम से कम अनुकरण में प्रवर्तित होना, कल्पनाशीलता एवं कर्मस्वतंत्रता के योगफल की महिमा रही है। मानव परंपरा के आरंभिक काल में सर्वाधिक भौगोलिक परिस्थितियाँ इस धरती पर प्रकट होने एवं वनस्पति मानव जाति के विकास के अनुकूल रहना आज भी जनमानस में स्वीकृत होता है क्योंकि शनै: शनै: वन का शोषण व क्षरण मानव के हाथों होना आँकलित होता है। ऐसी वनस्थली में आदिमानव के सम्मुख वन, वन्य-पशु, प्राणी, हवा, जल, सूर्य प्रकाश पृथ्वी ही प्रथम नैसर्गिकता के रूप में समीचीन रहते रहे हैं। इन सभी ने मानव पर प्रभाव डाला। इनमें से हवा, जल, प्रकाश धरती की स्वीकृति और जंगल, वन्य प्राणी तथा उनसे संपन्न होने वाले क्रियाकलाप की अस्वीकृति रही, फलस्वरूप वन्य प्राणियों के साथ हिंसक रवैया और वनस्थली को मैदान बनाने का रवैया मानव ने अपनाया। इसी क्रम में परिवार और ग्राम कबीलों में परिस्थितिजन्य मान्यता, रूढ़ियों को अपनी-अपनी भाषा विधि से अग्रिम पीढ़ियों में संप्रेषित करने का कार्य भी होता ही रहा। आदिकाल में भय के अलावा भाषा में वर्णन करने की कोई वस्तु ही नहीं रही। इसके अलावा कोई चीज रही है - वह है क्रूर वन्य प्राणियों के साथ जूझकर मारने के उपरान्त उत्सव मनता ही रहा। उत्सव से आरंभ हुआ अलंकार और श्रृंगार वस्तुओं का उत्पादन और उपभोग। यह आज अत्याधुनिक युग में भी स्वीकृत होता ही है।