- ⁘ कर्त्तव्य :- संबंधों की पहचान सहित निर्वाह क्रिया, जिससे निष्ठा का बोध होता है ।
- ⁘ दायित्व :- संबंधों की पहचान सहित मूल्यों का निर्वाह सहित मूल्यांकन क्रिया जिससे तृप्ति का बोध होता है ।
- ● कर्त्तव्य की पूर्ति है, भोगरूपी आवश्यकता की पूर्ति नहीं है ।
- ● कर्त्तव्य की पूर्ति इसलिये सम्भव है कि वह निश्चित व सीमित है ।
- ● भोगरूपी आवश्यकताओं (सुविधा-संग्रह) की पूर्ति इसलिये सम्भव नहीं है कि वह अनिश्चित एवम् असीमित है ।
- ● यही कारण है कि कर्त्तव्यवादी प्रगति शान्ति की ओर तथा भोगवादी प्रवृत्ति अशान्ति की ओर उन्मुख है ।
- ● समस्त कर्त्तव्य सम्बन्ध एवम् सम्पर्क की सीमा तक ही है ।
- ● सम्वेग से ही चयन क्रिया है जो संग्रहवादी, पोषणवादी, दोहनवादी, त्यागवादी या शोषणवादी है । यह समस्त क्रियाएँ आशा की प्रक्रिया में है ।
- ● कर्त्तव्य की पूर्ति के बिना मानव का जीवन सफल नहीं है ।
- ● भौतिक समृद्धि तथा बौद्धिक समाधान से परिपूर्ण जीवन ही सफल जीवन है ।
- ● आवश्यकता से अधिक उत्पादन तथा सहअस्तित्व में ही भौतिक समृद्धि है तथा अस्तित्व में अनुभव स्वयं निर्भ्रमता एवं बौद्धिक समाधान है ।
- ● विज्ञान एवम् विवेक का समन्वित अध्ययन तथा कर्माभ्यास ही निर्भ्रमता सहज प्रमाण ।
- ● मानवीयतापूर्ण जीवन में आवश्यकताएँ सीमित एवम् मर्यादित हो जाती हैं । अतिमानवीयतापूर्ण जीवन में तो आवश्यकताएँ और भी संयत हो जाती है ।
- ● जो जितना भ्रम और भय का पात्र है, वह साधनों को सुखी होने के लिये उतना ही महत्वपूर्ण मानता है । जैसे भय त्रस्त मानव आयुध एवम् आश्रय पर, लोभ त्रस्त मानव संग्रह पर , द्वेष त्रस्त मानव नाश पर, अज्ञानी दूसरों को दोष देने पर, अभिमान त्रस्त दूसरों की उपेक्षा एवम् घृणा करने पर ही सुखी होने का प्रयास करता है, जबकि स्व-पात्रता ही सुखी एवम् दुःखी होने का कारण है ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द