• कर्त्तव्य :- संबंधों की पहचान सहित निर्वाह क्रिया, जिससे निष्ठा का बोध होता है ।
  • दायित्व :- संबंधों की पहचान सहित मूल्यों का निर्वाह सहित मूल्यांकन क्रिया जिससे तृप्ति का बोध होता है ।
  • कर्त्तव्य की पूर्ति है, भोगरूपी आवश्यकता की पूर्ति नहीं है ।
  • कर्त्तव्य की पूर्ति इसलिये सम्भव है कि वह निश्चित व सीमित है ।
  • भोगरूपी आवश्यकताओं (सुविधा-संग्रह) की पूर्ति इसलिये सम्भव नहीं है कि वह अनिश्चित एवम् असीमित है ।
  • यही कारण है कि कर्त्तव्यवादी प्रगति शान्ति की ओर तथा भोगवादी प्रवृत्ति अशान्ति की ओर उन्मुख है ।
  • समस्त कर्त्तव्य सम्बन्ध एवम् सम्पर्क की सीमा तक ही है ।
  • सम्वेग से ही चयन क्रिया है जो संग्रहवादी, पोषणवादी, दोहनवादी, त्यागवादी या शोषणवादी है । यह समस्त क्रियाएँ आशा की प्रक्रिया में है ।
  • कर्त्तव्य की पूर्ति के बिना मानव का जीवन सफल नहीं है ।
  • भौतिक समृद्धि तथा बौद्धिक समाधान से परिपूर्ण जीवन ही सफल जीवन है ।
  • आवश्यकता से अधिक उत्पादन तथा सहअस्तित्व में ही भौतिक समृद्धि है तथा अस्तित्व में अनुभव स्वयं निर्भ्रमता एवं बौद्धिक समाधान है ।
  • विज्ञान एवम् विवेक का समन्वित अध्ययन तथा कर्माभ्यास ही निर्भ्रमता सहज प्रमाण ।
  • मानवीयतापूर्ण जीवन में आवश्यकताएँ सीमित एवम् मर्यादित हो जाती हैं । अतिमानवीयतापूर्ण जीवन में तो आवश्यकताएँ और भी संयत हो जाती है ।
  • जो जितना भ्रम और भय का पात्र है, वह साधनों को सुखी होने के लिये उतना ही महत्वपूर्ण मानता है । जैसे भय त्रस्त मानव आयुध एवम् आश्रय पर, लोभ त्रस्त मानव संग्रह पर , द्वेष त्रस्त मानव नाश पर, अज्ञानी दूसरों को दोष देने पर, अभिमान त्रस्त दूसरों की उपेक्षा एवम् घृणा करने पर ही सुखी होने का प्रयास करता है, जबकि स्व-पात्रता ही सुखी एवम् दुःखी होने का कारण है ।
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