अध्याय – 18

सुख, शांति, संतोष और आनन्द

  • मानव ने अनुभूति में ‘सुख-शान्ति-संतोष और आनन्द’ सहज निरन्तरता पाने का प्रयास किया है ।
  • अनुभूति के लिये योग आवश्यक है । योग के प्राप्त एवम् प्राप्य दो भेद हैं ।
  • प्राप्य योग में किसी के योग में किसी का वियोग भी है । प्राप्त योग में न किसी का योग है और न ही किसी का वियोग है । प्राप्ति उसी की होगी जिसका अभाव होगा । प्राप्त योग (व्यापक सत्ता) से रिक्त मुक्त कोई इकाई नहीं है या क्रिया नहीं है । इसीलिये प्राप्य योग का ही सान्निध्य अथवा संग्रह होता है तथा प्राप्त योग की मात्र अनुभूति होती है ।
  • प्राप्त योगानुभूति के लिए सुयोग्य क्षमता, योग्यता और पात्रता ही अधिकार है । ऐसी सुयोग्य क्षमता, योग्यता और पात्रता प्राप्त करना ही इकाई के जागृति का चरमोत्कर्ष है ।
  • सुयोग्य क्षमता, योग्यता और पात्रता के लिये सहअस्तित्व में अध्ययन है । अनुभव के लिए मानव ने अध्ययन, प्रयोग, अनुसंधान तथा अभ्यास भी किये हैं, जो मानवीयता और अतिमानवीयता के रूप में परिलक्षित हुआ है ।
  • # इस दिशा में जागृति का परिचय चैतन्य, ज्ञानावस्था के जागृत मानवों में ही पाया जाता है, जो मानव, देव मानव एवम् दिव्य मानव के रूप में है । मानव देव तथा दिव्य मानवों की संख्या वृद्धि के लिए समुचित प्रयोग, अध्ययन, व्यवहार व व्यवस्था के स्तर में एकसूत्रता को अनुस्यूत किया जाना मानव कुल के लिये अति आवश्यक है, क्योंकि ऐसे विकसित मानवों द्वारा अपराध या अपव्यय की संभावना नहीं है ।
  • अज्ञान, अत्याशा तथा अभाववश ही मानव अपराध करता है और अविवेकवश ही अपव्यय करता है ।
  • अपराध और अपव्यय, यह दोनों व्यवहार, मानवीयता और सामाजिकता की दृष्टि से सहायक नहीं है । अजागृति वश अपराध है ।
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