● मानव समुदाय न्याय तथा अवसर भेद से प्रवृत्त रहना स्पष्ट है ।
⁘ आश्रय :- जिससे जिसका अस्तित्व या व्यवहार नियंत्रित है, वह उसका ‘आश्रय’ है।
● आश्रित के आश्रय पाने के नियम की ‘नियंत्रण’ संज्ञा है ।
● न्यायाश्रित मानव मात्र सत्यासत्य, धर्माधर्म तथा न्यायान्याय के ज्ञाता, व्यवहारिक एकसूत्रता स्थापित करने में कुशल व निर्दोष जीवन में रत रहते हैं, जिससे ही मानवीयता संरक्षित है ।
● अवसरवादी मानव प्रियाप्रिय, हिताहित, लाभालाभ से ग्रसित तथा व्यवहार में दिखावा करते हैं । जिनसे असंतुष्टि, व्याकुलता व अनिश्चयता की पीड़ा ही उपलब्ध होती है, क्योंकि अज्ञान की मान्यताएँ शीघ्र परिवर्तनशील है । अवसरवादी मानव के कर्त्तव्य का लक्ष्य भी सुख है, पर वह इस प्रणाली से सफल नहीं होता ।
● व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय जीवन में क्लेश, कलह व आतंक उत्पन्न करने वाली समस्त प्रवृत्ति को ‘सदोष विचार’ या ‘अवसरवादी विचार’ और हर्ष, उत्साह, सहअस्तित्व, निर्भ्रमता को उत्पन्न करने वाले कार्य एवं विचार को ‘निर्दोष विचार’ या ‘न्यायवादी विचार’ की संज्ञा है ।
● क्लेश, कलह व आतंक का कारण केवल संग्रह, द्वेष, अज्ञान अभिमान एवं भय है ।
● अवसरवादी विचार या सदोष विचार - व्यवहार, हृदय, प्राण, मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि के परस्पर विरोधी विचार हैं, जिससे क्षोभ, खेद, तृष्णा, दु:ख, अशांति तथा असंतोष की पीड़ा होती है ।
● व्यवहार व हृदय के परस्पर विरोध से क्षोभ, हृदय व प्राण के परस्पर विरोध से खेद, प्राण व मन के परस्पर विरोध से तृषा, मन व वृत्ति के परस्पर विरोध से दु:ख का, वृत्ति व चित्त