• छः ओर से सीमित पिण्ड की इकाई तथा ऐसी ही अनेक इकाई अथवा इकाईयों के समूह को अनन्त एवम् असीम स्थिति को निरपेक्ष ऊर्जा संज्ञा है, यही व्यापक सत्ता है। व्यापक निरन्तर मानव के द्वारा आनन्द के अर्थ में अनुभूत है ।
  • सीमित अर्थ से मात्र सुख और दुःख भासता है । सुख और दुःख का मन वृत्ति में भास, वृत्ति चित्त में आभास होता है । सुख की निरन्तरता में चित्त बुद्धि में प्रतीति, आत्मा में अनुभूति होना पाया जाता है, जिसकी निरन्तरता होती है ।
  • इच्छानुसार द्रवित होने वाले और चेष्टा करने वाले अंग की इन्द्रिय संज्ञा है, जिनको शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंधेन्द्रियों के नाम से जाना जाता है ।
  • परिणामवादी फल की ओर की गई चेष्टा या प्रयास को ‘अपूर्ण प्रयास’ एवम् अपरिणामवादी फल की ओर अर्थात् क्रियापूर्णता और आचरणपूर्णता के अर्थ में की गई चेष्टा या प्रयास को ‘पूर्ण प्रयास’ संज्ञा है ।
  • नित्य एवम् शाश्वत् सत्ता में सत्य प्रतीति, सत्य प्रतीति से सत्य बोध व अनुभूति, सत्य बोध व अनुभूति से संतुलन, संतुलन से स्फुरण, स्फुरण से जागृति, जागृति से समाधान, समाधान से व्यवहार शुद्धि, व्यवहार शुद्धि से सहअस्तित्व, सहअस्तित्व से स्वर्गीयता, स्वर्गीयता से निर्विरोध भाव तथा निर्विरोध भाव से नित्य एवम् शाश्वत् सत्य बोध है ।
  • आवश्यकता भेद से ही लक्ष्य भेद है, जिसमें (चैतन्य पक्ष की जागृति) पारलौकिक लक्ष्य से मानव जीवन सफल होता है, अन्यथा असफल ही है । विकृत विचार से मूलतः व्यवहारिक व्यवधान तथा सुसंस्कृत संस्कार से व्यवहार सुगमता पाई जाती है ।

“सर्व शुभ हो”

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