अध्याय - 11

योग

  • योग के प्राप्त एवं प्राप्य दो भेद हैं ।
  • जो प्राप्य है, उसमें आसक्ति ही संपूर्ण योग संयोग वियोग का कारण है ।
  • मध्यस्थ व्यवहार, विचार एवं अनुभव ‘प्राप्त योग’ है, जो अनवरत उपलब्ध है, वर्तमान है।
  • एकत्व व निकटत्व के भेद से प्राप्य योग है ।
  • सजातीय मिलन की एकत्व तथा विजातीय मिलन की निकटत्व संज्ञा है । मानव का एकत्व केवल पाण्डित्य, कुशलता एवं निपुणता में है ।
  • इकाई का ह्रास व विकास प्राप्य योग पर ही है ।
  • विकास वादी योग की सुयोग तथा ह्रासवादी योग की कुयोग संज्ञा है ।
  • न्याय एवं धर्म-सम्मत विचार व व्यवहार सम्पन्न एवं सत्यानुभूति सहित मानव जागृत या विकसित, न्याय एवं धर्म सम्मत विचार व व्यवहार संपन्न अर्ध विकसित, न्याय-सम्मत विचार व व्यवहार संपन्न मानव अल्प विकसित प्रगति तथा अन्यायासक्त विचार तथा व्यवहार संपन्न मानव ह्रास की ओर गतिवान है जो पशु मानव व राक्षस मानव के रूप में हैं ।
  • जो जिसका अपव्यय करेगा वह उससे वंचित हो जाएगा ।
  • मानव ह्रास में आसक्ति के फलस्वरूप प्राप्त बल, बुद्धि, रूप, पद और धन का अपव्यय करता है । जड़ पक्ष को वरीय मान लेना ही ह्रास है ।
  • मानव के लिये आवश्यकीय नियम मानवीयता का संरक्षण ही है जो न्याय एवम् समाधान है, जिसके पालन से स्वर्गीयता का प्रसव है । इसके विपरीत मानव के लिए अनावश्यकीय नियम मानवीयता का शोषण ही है, जो अन्याय है, जिसमें विवशता से नारकीयता का प्रसव होता है ।
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