मानव धर्म नीति

परिभाषा

अर्थ की सदुपयोगात्मक नीति ही धर्मनीति है ।

  • मानव की सार्वभौमिक साम्य कामना सुख की अनुभूति हेतु मानव के समस्त सम्पर्क एवं संबंध के निर्वाह के लिए समाधान, समृद्धि, अभय व सहअस्तित्व सहज प्रमाण प्रस्तुत करने हेतु निश्चित कार्यक्रम की ‘मानव धर्म नीति’ की संज्ञा है ।

आवश्यकता

  • मानव धर्मनीति सहज समझ तथा परिपालन इसलिए आवश्यक है कि मानव प्रयोग एवं उत्पादन द्वारा प्राप्त अर्थ तथा प्राप्त प्राकृतिक संपदा के सदुपयोग की कामना करता है ।
  • # धर्मनीति का अध्ययन मानव के परस्परता में पाये जाने वाले सम्पर्क एवं संबंध का अध्ययन है क्योंकि मानव संपर्क एवं संबंध से सुखी अथवा दुःखी हो रहा है न कि वस्तु, वाहन आदि से ।

लक्ष्य अथवा साध्य

  • अमानवीयता से मानवीयता की ओर गुणात्मक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करने हेतु समाधान, साधन, अवसर तथा व्यवस्था उपलब्ध कराना, जो अतिमानवीयता के लिये प्रोत्साहन एवं मार्गदर्शन देने में समर्थ हो ।
  • प्रत्येक मानव में साध्य को पाने हेतु तीन बातों का होना अनिवार्य :-
  • 1. साधक, 2. साधना, 3. साधन ।

1. साधक : प्रत्येक मानव को ‘साधक’ की संज्ञा है, वह क्रम से व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र तथा अंतर्राष्ट्रीय भेद से है ।

2. साधना : तन, मन तथा धन सहित मानवीय दृष्टि, विषय एवं स्वभाव सहित साध्य (मानवीयता एवं अतिमानवीयता) को पाने हेतु प्रयुक्त क्रिया प्रणाली को ‘साधना’ की संज्ञा है ।

Page 132 of 219