● मानव के लिये मानवीयता, देवमानवीयता, दिव्यमानवीयता ही एक मात्र सुख शांति संतोष आनन्द के लिए आधार है । सुख हर स्तर का लक्ष्य है अर्थात् सुख अमानवीयता, मानवीयता तथा अतिमानवीयता का भी लक्ष्य है ।
● भ्रमवश मानव ने लाभ द्वारा सुखी होने की कामना की है ।
● भाव से समाधान, समाधान से सदुपयोग, सदुपयोग से अधिकार, अधिकार से व्यवस्था, व्यवस्था से समाधान-समृद्धि-अभय-सहअस्तित्व, समाधान-समृद्धि-अभय-सहअस्तित्व से भाव होता है ।
● शोषण पूर्वक प्राप्त आय से एक से अनेक तक सुखी नहीं है ।
● शोषक का शुष्क होना अनिवार्य है, क्योंकि क्रिया की अनुवर्ती क्रिया समान होती है ।
● जब कमाते हैं, तब गंवाते नहीं; जब गंवाते हैं, तब कमाते नहीं ।
● सद्व्यय ही कमाई का प्रयोजन है और अपव्यय ही गंवाई है । इसीलिये सद्व्यय पूर्वक ही मानव न्यायपूर्ण आय को पाकर सफल तथा सुखी है, अन्यथा असफल एवं दु:खी है ।
● तन, मन तथा धन का ही व्यय किया जाता है ।
● मानव, परिवार, समाज, राष्ट्र एवं लोक क्रम से अन्योन्याश्रित है जिनका अध्ययन तथा अनुसरण करने का अवसर समस्त मानव को प्राप्त है ।
● मानव, परिवार, समाज, राष्ट्र तथा लोक, प्राप्त अवसर तथा अनुसरण क्रिया के आवश्यकीय नियमों के पालन द्वारा ही सफल हुए हैं । इसके विपरीत असफल हुए हैं ।
● मानवीयतापूर्ण व्यवहार पक्ष का पूर्ण अध्ययन ही मानव कुल के एकसूत्रता सहज सूत्र है।