अध्याय – 17

रहस्य मुक्ति

  • समझ को प्रगट न करना या न कर सकना या समझ सम्पन्न नहीं हो पाना ही रहस्य है तथा इसके लिए जो अक्षमता है उसे ‘रहस्यता’ संज्ञा है ।
  • इकाई क्रिया है । मानव ही सहअस्तित्व में अनुभवमूलक विधि से संपूर्ण समझ संपन्न होता है । जागृत मानव, भ्रमित मानव के जागृति का मार्ग प्रशस्त कर स्वयं के जागृति को प्रमाणित करता है ।
  • प्रत्येक इकाई का सर्वांगीण दर्शन उसके रूप, गुण, स्वभाव व धर्म से होता है । इनमें से रूप, गुण और स्वभाव समझ में आता है और धर्म की मात्र अनुभूति ही संभव है, जो अनुभव प्राप्त इकाई द्वारा एक प्रक्रियाबद्ध अनुभव के संभावना पूर्ण आदेश, संदेश एवं निर्देश व अध्ययन से ही संभव है ।
  • जीवन में अनुभव सहअस्तित्व में होना स्पष्ट है । अनुभवमूलक विधि से पाँचों ज्ञानेन्द्रियों द्वारा संज्ञानशीलता पूर्वक व्यवस्था में प्रमाणित होना स्वाभाविक है । इसी आधार पर मन में मूल्यों का आस्वादन क्रिया संपन्न होता है । तब संज्ञानशीलता अर्थात् सहअस्तित्व समाधान प्रधान रूप में प्रमाणित होता है । यही मूल्यों के आस्वादन के रूप में परिलक्षित होता है । यही निरंतर सुख का प्रमाण है और संज्ञानशीलता पूर्वक संवेदना नियंत्रित होने का प्रमाण है ।
  • जीवन सदा सुख की पिपासा से तृषित रहता है ।
  • # सुख की उपलब्धि के लिये पंचेन्द्रियों द्वारा अजस्त्र प्रयत्न के पश्चात् भी उसकी (सुख की) अक्षुण्णता या निरंतरता न हो पाने के परिणाम स्वरूप ही ऐसे सुख की निरंतरता की संभावना की ओर मानव पुन: प्रयत्नशील होता है । ऐसी संभावना इस सिद्धांत पर है कि जिसका चैतन्य पक्ष जितना जागृत है उसके पूर्ण होने व प्रमाणित होने की उतनी ही संभावना है । जिससे सुख की निरंतरता होती है । यही कारण है कि मानव अपने से अधिक जागृत से संपर्क एवं संबंध के लिये प्रयत्नशील रहता है ।
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