- ⁘ फल :- जिस अवधि के अनंतर क्रिया प्रणाली बदलती है, उस अवधि को फल संज्ञा है ।
- ⁘ प्रभाव :- विकास के लिए जो स्वीकृति है, उसको प्रभाव संज्ञा है ।
- ⁘ अनुभव :- अनुक्रम से प्राप्त समझ अथवा अनुक्रम में निहित प्रभावों की पूर्ण स्वीकृति ही अनुभव है अथवा जिसके आश्रित जो प्रभाव हो वह उस का अनुभव है ।
- ⁘ अनुक्रम :- कड़ी से कड़ी अथवा सीढ़ी से सीढ़ी जुड़ी हुई विधि । सहअस्तित्व में ही अनुक्रम व अनुभव है ।
- ⁘ प्रतिभाव :- अनुभव के अनंतर बोध, चिंतन के रूप में प्रमाणित करने हेतु प्रवृत्ति ही प्रतिभाव है ।
- ⁘ स्वभाव :- प्रतिभाव से युक्त स्वमूल्यन की स्वभाव संज्ञा है ।
- ⁘ आसक्ति :- ह्रास अथवा भ्रम की ओर होने वाली या की जाने वाली गलतियों को सही मान लेना आसक्ति है । यही अमानवीयता है ।
:- ह्रास की ओर किया गया गलत मूल्यांकन ही आसक्ति है ।
- ⁘ भाव :- मूल्यांकन एवं मौलिकता की भाव संज्ञा है । भाव मौलिकता है, यथा जिस अवस्था और पदों में जो अर्थ, स्वभाव और धर्म के रूप में होते हैं, वह उसकी मौलिकता है । मानव सुखधर्मी है । धीरता, वीरता, उदारता, दया, कृपा, करुणा स्वभाव है ।
भाव = मौलिकता = मूल्य = जिम्मेदारी, भागीदारी = फल परिणाम = मूल्यांकन ।
जबकि भ्रमित मानव में हीनता, दीनता, क्रूरता स्वभाव है । तथा आसक्ति और प्रलोभन को धर्म माने रहता है ।
- ● लोक व लोकेश भेद से लक्ष्य, अंतरंग एवं बहिरंग भेद से यत्न, व्यष्टि एवं समष्टि भेद से प्रयास, ह्रास एवं विकास भेद से प्रगति, न्यून व पूर्ण भेद से फल, सम-विषम तथा मध्यस्थ भेद से प्रभाव, इंद्रिय एवं इंद्रियातीत भेद से अनुभव, सहज एवं असहज भेद से प्रतिभाव, विहित एवं अविहित भेद से प्रवृत्ति व आसक्ति तथा उच्च और नीच भेद से भाव की स्थिति मानव में है । जीवन ही लक्ष्य का धारक-वाहक है ।