● लौकिक व्यवहार :- भ्रमित मानव में कार्य-व्यवहार चार विषयों में ग्रसित रहना पाया गया है । भ्रमित कार्य-व्यवहार प्रवृत्ति ही लोक आसक्ति है ।
⁘ विषय चतुष्टय :- आहार, निद्रा, भय और मैथुन ।
⁕ जागृत मानव में ऐषणा त्रय व्यवहार है । इसका तात्पर्य धरती पर व्यवस्था में भागीदारी, अनुभव मूलक विधि से जीना, आलोकित रहना, प्रकाशित रहने से है ।
⁘ ऐषणा त्रय :- पुत्रेषणा, वित्तेषणा, लोकेषणा ।
● पारलौकिक व्यवहार :- अनुभव मूलक प्रमाण सहित जीना ।
⁕ ऐषणा मुक्त व्यवहार ।
● जो जिसको लक्ष्य मानता है, वह उसको पाने के लिए प्रयासरत रहता है । मानवीय लक्ष्य समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व ही है ।
● लक्ष्य भेद से प्रयास, प्रयास भेद से प्रगति, प्रगति भेद से फल, फल भेद से प्रभाव, प्रभाव भेद से अनुभव, अनुभव भेद से प्रतिभाव, प्रतिभाव भेद से स्वभाव, स्वभाव भेद से यर्थाथ, यर्थाथता ही मानव लक्ष्य सहज परंपरा है ।
⁘ लक्ष्य :- जिसको पाना है वह लक्ष्य है । जागृति पूर्वक ही मानव लक्ष्य सुनिश्चित होता है । यह समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व सहज प्रमाण है ।
⁘ प्रयास :- लक्ष्य की उपलब्धि के लिये यत्नपूर्वक किए गए कार्य की प्रयास संज्ञा है।
⁘ प्रगति :- पूर्व से भिन्न आगे गुणात्मक विकास की ओर गति को प्रगति संज्ञा है । श्रेष्ठता और गुरुमूल्य की ओर गति ।