अध्याय - 9

दर्शन-दृश्य-दृष्टि

  • दर्शन के लिये दर्शक, दृश्य और दृष्टि का रहना अनिवार्य है ।
  • दर्शक की क्षमता, दृष्टि के परिमार्जन के योग से दृश्य के साथ दर्शन क्रिया है । जो जैसा है, उसको वैसा ही समझने की क्षमता, उसे वैसा ही देखने की प्रक्रिया के योग से दर्शन क्रिया है ।
  • दर्शन के भेद से लक्ष्य भेद है, क्योंकि जो जैसा जिसका दर्शन करता है, उसके अनुसार उसके साथ जो अर्थ है, उसको लक्ष्य स्वीकारता है । यह मूल्यांकन क्रिया भ्रम और जागृति को स्पष्ट करता है ।
  • वातावरण, अध्ययन, पूर्व संस्कारों के अनुबन्धानुक्रम विधि से दर्शन क्षमता, योग्यता एवम् पात्रता है । क्षमता, योग्यता एवम् पात्रता के अनुसार ही जागृति एवम् ह्रास की ओर गति है ।
  • दृष्टि द्वारा प्राप्त समझ (व्यंजना पूर्वक/स्वीकृति) को दर्शन संज्ञा है ।
  • दर्शन :- न्याय-धर्म-सत्य सहज दृष्टि द्वारा की गई क्रिया-प्रक्रिया की दर्शन संज्ञा है।
  • प्राकृतिक एवम् मानवकृत भेद से वातावरण है ।
  • दर्शन, विचार, शास्त्र, इतिहास एवम् काव्य भेद से अध्ययन है ।
  • शास्त्र :- निर्दिष्ट लक्ष्योन्मुख सिद्धान्त-प्रक्रिया एवम् नियम तथा वस्तुस्थिति का निर्देशपूर्वक बोध कराने वाले शब्द व्यूह की शास्त्र संज्ञा है ।
  • काव्य :- जागृत मानव के भाव, विचार एवम् कल्पना-शीलता जो मानव लक्ष्य के अर्थ में हो, को दूसरों तक प्रसारित करने हेतु प्रयुक्त शब्द व्यूह की काव्य संज्ञा है ।
  • इतिहास :- विगत की मानवीयता की ओर कृतियों एवम् घटनाओं के श्रृंङ्खलाबद्ध क्रम के स्मरणार्थ प्रस्तुत भाषा या शब्द राशि की इतिहास संज्ञा है ।
  • वंशानुगत अध्यास, विधि विहित तथा विधि हीन भेद से प्रयोग है ।
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