⁘ राज्य नीति का अर्थ :- तन, मन एवम् धन की सुरक्षा के लिए विधि व्यवस्था प्रदान करने हेतु जो मानवीयता पूर्ण कार्यक्रम है, उसे ‘राज्य नीति’ संज्ञा है ।
⁘ राज्य :- जिस भू क्षेत्र में मानव का आवास एवं व्यवसाय है और साथ ही जो एक ही व्यवस्था तंत्र के आश्रित हो एवं सार्वभौम व्यवस्था तंत्र में भागीदार हो, उसे ‘राज्य’ संज्ञा है ।
आवश्यकता
● मानव प्रयोग व व्यवसाय द्वारा प्राप्त अर्थ तथा प्राकृतिक सम्पदा की सुरक्षा की कामना करता है, क्योंकि उसमें उसका श्रम नियोजित एवम् प्रयोजित है । ऐसा सुरक्षा के लिये राज्य-नीति का अध्ययन व समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी का परिपालन आवश्यक है ।
लक्ष्य अथवा साध्य
● राज्य नीति का लक्ष्य अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था की अक्षुण्णता है ।
● अमानवीयता से मानवीयता की ओर प्रगति हेतु मार्ग प्रशस्त करने के लिए साधन, अवसर तथा व्यवस्था की स्थापना एवम् सुरक्षा जो अतिमानवीयता को प्रोत्साहन देने में समर्थ हो।
⁕ राज्यनीति सहज लक्ष्य को सार्थक और सर्वजन सुलभ बनाने की कामना से समझदारी की आवश्यकता है । समझदारी सहअस्तित्व रूपी अस्तित्व दर्शन ज्ञान, चैतन्य प्रकृति रूपी जीवन ज्ञान और मानवीयता रूपी आचरण ज्ञान ही संपूर्ण ज्ञान है । हर नर-नारी इसका ज्ञाता कर्ता-भोक्ता होने के योग्य ही है । इसे एक से अनेक मानव तक बोधगम्य, अनुभव गम्य रूप में प्रमाणित होना आवश्यक है । यही एक मात्र उपलब्धि अथवा जागृति ही संपूर्ण भ्रम को दूर करने के लिए पर्याप्त है ।
⁕ जागृत मानव परंपरा में राज्य का स्वरूप अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था सूत्र अध्ययन से और आचरण से व्याख्या होने के आधार पर विधि को पहचानने के मुख्य