• संपूर्ण कृतियाँ ह्रास की ओर अथवा विकास की ओर ही हैं ।
  • कारण (क्रिया की पृष्ठभूमि) स्फुरण अथवा प्रेरणा भेद से है, जो संस्कार का रूप है ।
  • प्रभाव सम, विषम तथा मध्यस्थ तीन ही प्रकार के हैं, जो क्रिया-प्रतिक्रिया, फल-परिणाम के रूप में परिलक्षित होते हैं ।
  • फल के दो भेद हैं :- पूर्ण फल और न्यून फल । प्रत्येक क्रिया किसी आवश्यकता की पूर्ति के लिये ही संपन्न की जाती है । क्रिया की प्रतिक्रिया के अंतिम परिणाम में आशय की पूर्ति होने पर पूर्ण फल तथा अपूर्ति होने पर न्यून फल की संज्ञा है ।
  • साधक, साध्य तथा साधन समुच्चय की औचित्यता समन्वित होने पर पूर्ण फल होता है ।
  • मानव द्वारा मानवीयता के प्रति कर्त्तव्य-बुद्धि को अपनाये बिना जागृति, जागृति के बिना समाधान-समृद्धि, समाधान-समृद्धि के बिना मानवत्व-समत्व, मानवत्व-समत्व के बिना पूर्ण फल, पूर्ण फल के बिना परंपरा में स्फुरण या प्रेरणा और स्फुरण या प्रेरणा के बिना कर्त्तव्य बुद्धि प्राप्त नहीं होती है ।
  • मानवीयतापूर्ण बुद्धि द्वारा निश्चित कर्त्तव्य के परिपालन से मानव सफल एवं सुखी हुआ है ।
  • कारण :-चेष्टा को आशा, विचार, इच्छा व संकल्प पूर्वक कार्य चेष्टा में प्रवृत्त करने हेतु प्राप्त पृष्ठभूमि की कारण संज्ञा है ।
  • प्रभाव :-वातावरण, अध्ययन एवं अभ्यास पूर्वक पूर्ण संस्कार ही प्रभाव है ।
  • फल :- संस्कार का प्रभाव ही फल है ।
  • मानव में अध्यास से वंशानुषंगिक शरीर संरचना तथा योग की घटना है । चैतन्य पक्ष में संस्कार मन, वृत्ति, चित्त एवं बुद्धि जागृत होने के रूप में उपलब्धि है, जो मानवीयता और अतिमानवीयता के रूप में परिलक्षित होती है । यह जागृत परंपरा की देन है ।
  • अध्यास :- अध्यास का तात्पर्य प्राणावस्था में कार्यरत प्राणकोशाओं में स्पष्ट रहता है । इसका स्वरूप प्राणसूत्रों में निहित रचना विधि है ।

“सर्व शुभ हो”

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