- ⁕ अनंतर जैसे ही परमाणु विकसित होकर चैतन्य पद में संक्रमित होता है वह भारबंधन व अणु बंधन से (समूह बंधन) मुक्त हो जाता है पर तत्काल ही आशा के बंधन से युक्त हो जाता है । यह आशा मात्र जीने की ही रहती है ।
- ⁕ इससे ज्ञात होता है कि वर्तमान में मानव जिस समुदाय में सामाजिकता को पाना चाहता है उसके मूल में भय है ही । इसकी निवारण प्रक्रिया या आशय या प्रवृत्ति मानव में से, के लिए विकसित चेतना में संक्रमण है । इससे यह स्पष्ट सिद्ध होता है कि मानव ज्ञान विवेक विज्ञान पूर्वक गुणों व स्वभावों के उपार्जन से अपनी मौलिकता सिद्ध करता है । इसी परिप्रेक्ष्य में योजना एवं प्रक्रिया पूर्वक केवल मानवीयता, अतिमानवीयता और अमानवीयता का ही रेखाकरण सिद्ध होता है । इसके आधार पर ही सामाजिकता के सभी आयामों का अध्ययन है ।
- ⁕ इस प्रकार सम्पूर्ण मानव को एक जगह में पाने की तथा एक जगह में होने की इच्छा के मूल कारण में उसका ‘सुखधर्मी’ होना है ।
- ⁕ सभी मानव सुख के लिये प्रत्याशी हैं । सुख के लिये प्रयास कर रहे हैं । सर्वमानव सुख का अनुभव करना चाहते हैं । इसी केन्द्र बिन्दु के आधार पर सभी पक्षों का अध्ययन, नीति एवं व्यवहार में निष्ठान्वित होना एक आवश्यकता है ।
“सर्व शुभ हो”