• स्थिति व क्रिया मात्र को जानने में जो अपूर्णता है, वह रहस्य है ।
  • रहस्यता का निवारण मात्र यथार्थ दर्शन से ही है ।
  • यथार्थ दर्शन से ‘निश्चय’ है, अन्यथा अनिश्चयवादी प्रवृत्ति के कारण संशय बना ही रहता है ।
  • विवेक व विज्ञान सम्मत विचार तथा क्रिया का परिपूर्ण ज्ञान ही यथार्थ ज्ञान है ।
  • परिपूर्ण ज्ञान :- क्रिया के नियम एवं प्रक्रिया की समझ, विचार के कारण तथा नियम की समझ को ‘परिपूर्ण ज्ञान’ संज्ञा है ।

:- परिपूर्ण ज्ञान मात्र विज्ञान एवं विवेक के अध्ययन से सम्पन्न होता है जिसमें पारंगत होने पर एक से अधिक तक का जीवन सफल होता है ।

  • सहअस्तित्व ज्ञान सम्मत विज्ञान एवं विवेक के अध्ययन से ही अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था प्रमाणित होता है ।
  • परिपाक :- किसी घटना के लिए की गई विविध प्रक्रिया का संयुक्त परिणाम फल ही परिपाक है ।
  • पदार्थ, वनस्पति, जीव एवं मानवों में पाई जाने वाली घटनाएं क्रमश: परिणामकृत, ऋतुक्रम, विषयक्रम तथा ईषणाक्रम से ही होती है ।
  • सापेक्षता; दृष्टि, दृश्य और दर्शन के भेद से है ।
  • दृष्टा, महत्तत्व, पुरुष, केन्द्रीय, स्वस्वरूप, अधिष्ठान, सहज, सर्वज्ञ, आत्मा यह सब एक ही की पर्यायवाची संज्ञाएं हैं । इन सब संज्ञाओं से संबोधित या निर्देशित एक ही तत्व है, वह चैतन्य परमाणु सहज मध्यांश है ।
  • प्रकृति में ही भौतिक रासायनिक वस्तु, वनस्पति तथा संवेदना व संज्ञानीयता की प्रेरणा, कल्पना, क्रिया-प्रतिक्रिया, प्रभाव, व्यंजना, क्रांति तथा समाधान जैसी परिपाकात्मक प्रवृत्तियाँ पाई जाती हैं ।
  • समस्त पदार्थ परिणाम-घटना-क्रम से, समस्त वनस्पति ऋतु-घटना-क्रम से, समस्त जीव विषय-घटना-क्रम से तथा समस्त मानव जीवन संस्कार-घटना-क्रम से व्यस्त है।
Page 111 of 219