• जागृत जीवन में आत्मा अनवरत ज्ञान में ओतप्रोत है ।
  • विषय-वासनावश मानव में संघर्ष है । ईषणात्रय में जन बल व धनबल आवश्यकतावश व्यवस्था में प्रवृत्ति स्पष्ट है । व्यवस्था के मूल में अध्ययन व प्रयोग है, जिससे ही विकास और जागृति का प्रमाण संभव हुआ है ।
  • ईर्ष्या तथा द्वेष के मूल में भ्रम ही है और ह्रास की ओर गति है ।
  • संकीर्णता में प्रयुक्त अर्थ की स्वार्थ, विशालता में प्रयोजित अर्थ की परार्थ तथा सार्वभौमिकता के अर्थ में प्रयुक्त अर्थ परमार्थ है ।
  • बल, धन, पद तथा यश के भेद से उपलब्धियाँ (लाभ) हैं । विज्ञान एवं विवेक के भेद से अध्ययन है, जो बुद्धि की क्रिया है । रूप जन्म-सिद्ध है ही ।
  • पात्र एवं कुपात्र को प्रदत्त पद एवं अधिकार भेद से नियोजन है ।
  • संघर्ष व उत्पादन भेद से बल की प्रयुक्ति है ।
  • उपभोग, सदुपयोग तथा उत्पादन भेद से अर्थ का नियोजन है ।
  • लोक एवं लोकेश भेद से लक्ष्य है ।
  • एक मानव से अनंत मानव तक किए गए समस्त व्यवहारों व कार्यों से समस्या या समाधान की ही उपलब्धि है ।
  • हृदय तृप्ति के लिए; प्राण बल के लिए; मन सुख के लिए; वृत्ति शांति के लिए; चित्त संतोष के लिए; बुद्धि आंनद के लिये; आत्मा अनुभव परमानन्द के लिए आतुर, कातुर आकांक्षित एवं प्रतीक्षित हैं ।
  • बुद्धि में पूर्ण बोध होने के साथ-साथ ही आत्मा में अनुभव होना पाया जाता है ।
  • आत्मा (स्वस्वरूप) पूर्ण, मध्यस्थ, व नित्य शांत है, इसीलिए उसमें या उस पर सम या विषम का आक्रमण सिद्ध नहीं होता है ।
  • आत्म-तत्व (स्वस्वरूप) को भी साम्य सत्ता अनवरत सुलभ एवं एक सी प्राप्त है, जिसको वह अनुभव करने में सक्षम है, इसीलिए आत्मा में विकार अर्थात्, सम-विषमात्मक
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