• ⁘ परिस्थिति :- समाधान से युक्त मानसिक तथा शारीरिक अवस्था की ‘परिस्थिति’ संज्ञा है ।
  • ⁘ योग :- स्वयम् में जिसका अभाव हो या अभाव प्रतीत होता हो, दूसरें में उसी की समृद्धि (स्वभाव) हो, ऐसे उभय-सान्निध्य की ‘योग’ संज्ञा है ।
  • ⁘ रति :- उपरोक्तानुसार प्राप्त उभय-सान्निध्य, मध्यस्थ-आकर्षण एवं प्रत्याकर्षण के प्रबल वेग की ‘रति’ संज्ञा है ।
  • ⁘ रत्यात्मक रति :- रति की निरंतरता से ‘रत्यात्मक रति’ है ।
  • ⁘ विरत्यात्मक रति :- रति की निरंतरता जिसमें नहीं है ।
  • ⁘ वियोग :- रति खंडन की ‘वियोग’ संज्ञा है ।
  • ⁘ मनाकृति :- योग वियोग से प्राप्त जानकारी सहित पुनर्कल्पना की ‘मनाकृति’ संज्ञा है।
  • ● विचार के अभाव में रति क्रिया सिद्ध नहीं है ।
  • ● जड़ के साथ रति क्रिया क्षणिक तथा अस्थाई, वैचारिक रति दीर्घकालिक तथा सत्य रति नित्यकालिक है जो केवल अनुभव और अनुभव की निरंतरता है ।
  • ● मृद, पाषाण, मणि और धातु व उसके विकार को ‘पदार्थाकार’, वनस्पति में पाई जाने वाली प्राण कोषाओं से रचित रचनाओं को ‘प्राणाकार’, पशु-पक्षी में पाई जाने वाली आशा को ‘जीवाकार’ और मानव में पाई जाने वाली क्रिया मात्र के प्रति दर्शन योग्य क्षमता सम्पन्न मन, वृत्ति, चित्त व बुद्धि को ‘ज्ञानाकार’ संज्ञा है ।
  • ● मूल्य और मूल्यांकन प्रक्रिया की ‘भाव-क्रिया’ संज्ञा है, जो यथार्थ एवं अयथार्थ भेद से व्यवहृत है, जिसका कारण मूल्यांकन करने वाली इकाई के जागृति एवं भ्रम रूप में भेद है।
  • ● जागृति से ही पूर्ण समझ सहित सही मूल्यांकन होता है अन्यथा अवमूल्यन या अधिमूल्यन होता है ।
  • ● मानव अपने जागृति के स्तर से तथा उसके अनुरूप ही मूल्यांकन क्रिया करता है ।
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