- ● अवसरवादिता के शीघ्र परिणामवादी होने के कारण इसके व्यवहार में एकसूत्रता का अभाव रहता है । एकसूत्रता के अभाव में आत्मोन्मुख बुद्धि न होने से बुद्धि क्षोभ, बुद्धि अनुयायी चित्त न होने से चित्त क्षोभ, चित्त अनुयायी वृत्ति न होने वृत्ति क्षोभ, वृत्ति अनुयायी मन न होने से मन: क्षोभ; मनोनुकूल प्राण, हृदय, शरीर व क्रिया न होने से संपर्कात्मक व संबंधात्मक व्यवहार में मन: क्षोभ होता है ।
- ● बुद्धि क्षुब्ध (अहंकार) मानव अपने ज्ञान को श्रेष्ठ, चित्त क्षुब्ध मानव अपने तर्क को श्रेष्ठ, वृत्ति क्षुब्ध मानव विचार व कार्य योजना को श्रेष्ठ, मन क्षुब्ध विषय भोग को श्रेष्ठ समझता है । फलस्वरूप ही वाद विवाद उत्पन्न होता है । अत: यह सिद्ध होता है कि अवसरवादिता ही वाद-विवाद का मूल कारण है क्योंकि यह अपराध से मुक्त नहीं है ।
- ● सत्य बोध न हो पाना ही बुद्धि क्षोभ है ।
- ● वाद-विवाद के लिए दोनों पक्षों का अथवा एक पक्ष का गलत (भ्रम में) रहना आवश्यक है, क्योंकि दोनों पक्ष सही हों और वाद विवाद हो ऐसा संभव नहें है ।
- ● अवसरवादी व्यवहार का मूल कारण बुद्धि का अथवा विज्ञानमय कोष व जागृति का पूर्ण विकसित न होना है ।
- # विज्ञानमय कोष के विकसित नहीं होने से ही भ्रम तथा अज्ञान है जो अवसरवादिता का द्योतक है । भ्रम तथा अज्ञान के बिना गलती संभव नहीं है । चैतन्य इकाई की अपारदर्शकता अपूर्ण विकास ही अज्ञान है। अपारदर्शकता का फल ही है विकासवादी नियमों की समझ न होना तथा फलस्वरूप ही अवसरवादिता है ।
- # कार्य करने की स्वतंत्रता के कारण ही मानव को न्यायान्याय, धर्माधर्म, सत्यासत्यात्मक विचार, इच्छा, संकल्पपूर्वक व्यवहार, विचार एवं अनुभव करने का अवसर प्राप्त है ।
- # जड़ सृष्टि में बीज, परिणाम एवं प्राण के भेद से और चैतन्य जीवन में बीज, आशा व इच्छा के रूप में वंशानुषंगी, संस्कारानुषंगी भेद से है । मानव में बीज संस्कारों के रूप में मन, वृत्ति, चित्त व बुद्धि में स्थापित होना पाया जाता है, क्योंकि हर भ्रमित व्यक्ति के बौद्धिक स्तर में अंतर है । बौद्धिक क्षमता का भेद ही मानव क्रियाकलाप में
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द