• हृदय और पाँच इन्द्रियों से संबंधित विषयों के प्रति जो आसक्ति या अनासक्ति है, उसी के आधार पर ही मानव जीवन की जागृत अवस्था का निर्णय है । मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि और आत्मा के संयुक्त क्रियाकलाप में जागृति प्रमाणित होती है ।
  • आहार, निद्रा, भय एवं मैथुन यह चार विषय हृदय का; स्वागत भाव एवं शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धेन्द्रियों द्वारा प्राप्त होने वाले आस्वादन में जो सुख एवं दुःख पक्ष है वह मन का; न्यायान्याय, धर्माधर्म, सत्यासत्य निर्णय वृत्ति का; रूप, गुण, स्वभाव मात्र का तथा सम, विषम, मध्यस्थ ज्ञान का चित्र रचना चित्त का और काल, क्रिया तथा सत्य का बोध बुद्धि का और सहअस्तित्व में अनुभव आत्मा का स्वत्व है ।
  • शरीर की हर क्रिया और व्यवहार-समुच्चय विचार-पक्ष के योग से ही है, जिसके लिये पंचेन्द्रियाँ माध्यम हैं ।
  • मानव ने अपनी सफलता का प्रयास स्वार्थ, परार्थ तथा परमार्थ मात्र से किया है ।
  • प्राण का विषय हृदय, हृदय का विषय इंद्रिय तथा इंद्रिय का विषय व्यवहार (कर्म) व भोग है । प्राण, हृदय को; हृदय, इंद्रियों को; इंद्रियाँ, व्यवहार व भोग को प्रेरित करते हैं ।
  • शरीर, हृदय एवं प्राण समूह को ‘स्थूल पिण्ड’ या ‘स्थूल शरीर’, मन, वृत्ति एवं चित्त को ‘सूक्ष्म शरीर’ और बुद्धि एवं आत्मा को ‘कारण शरीर’ संज्ञा है । यहाँ शरीर का तात्पर्य क्रिया से है ।
  • बुद्धि द्वारा बोध की क्रिया आत्माभिमुख विधि से जागृति को और भ्रमवश विमुख रह कर समस्या का कारण बना रहता है । इसी को जागृति व भ्रम संज्ञा है ।
  • आत्मा से विमुख बुद्धि ही ‘अहंकार’ है ।
  • आत्मा के संकेत-ग्रहण से वंचित रहना ही ‘आत्मा विमुखता’ है ।
  • कारण एवं सूक्ष्म शरीर के अनुसार इच्छाएँ हैं, कारण और सूक्ष्म क्रिया अविभाज्य है । तथा सूक्ष्म एवं स्थूल शरीर के अनुसार व्यवहार कार्य है ।
  • स्थूल पिण्ड का योग सूक्ष्म से प्राण के द्वारा है ।
  • सूक्ष्म एवं कारण शरीर का योग चित्त के द्वारा है । कारण एवं सूक्ष्म शरीर (क्रिया) अविभाज्य है ।
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