परिवार, समाज, राष्ट्र तथा अंतर्राष्ट्रीय भेद से विश्लेषण करना होगा । अंतर्राष्ट्रीय मानव समुदाय एक है तथा सब की साम्य कामना ‘सुख’ ही है । निरंतर सुख की उपलब्धि ही मानव का चरम विकास है तथा सुख की स्थिति में ही मानव अपने को वातावरण के दबाव से मुक्त अनुभव करता है । सुखी मानव अन्य का पोषण करने में भी समर्थ होता है ।

  • सुख एक बौद्धिक स्थिति है । ‘जीवन’ बल व शक्तियों की संगीतमयता व एकसूत्रता ही सुख है । सर्वमानव समाधान पूर्वक सुखी होता है ।
  • मानव ने बौद्धिक समाधान तथा भौतिक समृद्धि से सुख की कामना की है ।
  • यह उल्लेखनीय है कि ‘जीवन परमाणु’ सर्वोच्च विकसित पद है ।
  • बौद्धिक समाधान के मार्ग में सब से बड़ा अवरोधक तत्व भय है । मानव कुल तीन प्रकार के भय से पीड़ित हुआ है :-

(1) प्राकृतिक भय,

(2) पाशविक भय तथा

(3) मानव में निहित अमानवीयता का भय ।

  • # मानव का मानव से भय परधन, परनारी/परपुरुष तथा परपीड़ात्मक व्यवहार के कारण है । यही मानव में निहित अमानवीयता का भय है । परधन, परनारी/परपुरुष एवं परपीड़ात्मक व्यवहार से द्वेष, आतंक, हिंसा एवं प्रतिहिंसा उत्पन्न होती है ।
  • उपरोक्त तीनों से कुल चार प्रकार से मानव भयभीत है :-

(1) पद भय (2) मान भय (3) धन भय (4) मृत्यु भय ।

  • भौतिक समृद्धि के लिए मानव के पास केवल तीन ही अर्थ हैं :-

(1) तन (2) मन (3) धन ।

  • भ्रमित मानव ने तन, मन एवं धन के नियोजन से ही प्राप्त प्राकृतिक ऐश्वर्यों को उपयोग तथा भोग करते हुए प्राकृतिक भय, पाशविक भय तथा मानव में निहित अमानवीयता के भय से मुक्त होने की कामना की है ।
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