विकसित तक ही संबंध है जबकि समस्त इकाईयाँ परस्पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सम्पर्क में है ही ।

  • संपूर्ण संपर्क, संबंध के लिए प्रेरणा के श्रोत हैं । संपर्क दो प्रकार के होते हैं-

(1) प्राकृतिक संपर्क (2) मानव संपर्क ।

  • # प्राकृतिक संपर्क में जागृत मानव प्राकृतिक ऐश्वर्य का उपयोग व सदुपयोग करता है। समस्त भौतिक संपर्क तथा इसकी उपलब्धियाँ संबंध के निर्वाह के लिए ही होती है । मानव संपर्क से अपने विकास के लिए प्रेरणा पाता है अथवा उसके लिए प्रवृत्त होता है ।
  • # मानव संपर्क जो जागृति के लिये प्रेरणा देता है पोषण है ।
  • जो जिसका मूल्यांकन नहीं करेगा वह उसका सदुपयोग नहीं करेगा या नहीं कर सकेगा । अत: मानव के हर पक्ष का मूल्यांकन आवश्यक है ।
  • # सम्पूर्ण संबंधों के मूल में मूल्यांकन आवश्यक है । मूल्यांकन मौलिकता का ही होता है । मौलिकता के आधार पर ही कर्तव्य का निर्धारण तथा निर्वाह होता है । दायित्वों का निर्वाह जिस इकाई के प्रति होना है उस इकाई के प्रति न होने से उसका पोषण अवरूद्ध होता है अथवा शोषण है साथ ही जिस इकाई द्वारा दायित्व का निर्वाह होना है उसे, न होने की स्थिति में प्रतिफल के रूप में अविश्वास ही मिलेगा । अविश्वास ही द्रोह, विद्रोह तथा आतंक का कारण बनता है जो शोषण की ओर प्रेरित करता है ।
  • # प्रत्येक संबंध में सम्पर्क निहित है ही । संबंध में भाव (मौलिकता) पक्ष विशिष्ट है तथा भौतिक पक्ष गौण है । प्रत्येक संबंध में भाव का जितना तिरस्कार होता है भौतिक पक्ष उतना ही प्रबल होता है । संबंधों मे भाव का निर्धारण मानवीय परम्परा के अनुसार है । संबंधों के निर्वाह में भाव पक्ष का तिरस्कार कर भौतक पक्ष को वरीयता प्रदान कर जब आचरण किया जाता है तो अपने से अविकसित को विकास का लक्ष्य मान लेने की भ्रमित मान्यता का जन्म होता है जबकि समस्त भौतिक पक्ष मनुष्य से अविकसित है ही । इसलिए विकास का मार्ग अवरूद्ध होता है । परिणाामतः मानवों ने भौतिक उपलब्धियों के लिए ही युद्ध किया है ।
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