- # वैचारिक पक्ष के परिमार्जन से तथा विकास से ही परधन, परनारी/परपुरुष एवं परपीड़ा युक्त व्यवहार का उन्मूलन संभव है । विचार का परिमार्जन केवल इसके इससे श्रेष्ठ शक्ति के प्रभाव में आने पर ही संभव है क्योंकि यह नियम है कि अविकसित, विकसित के सान्निध्य में ही विकास की प्रेरणा पाता है और विकास को प्राप्त करता है। विचार पक्ष का परिमार्जन मात्र चित्त के प्रत्यावर्तन से ही संभव है जिससे वैचारिक पक्ष में मानवीयता के प्रति आदर का भाव उत्पन्न होकर तदनुरूप व्यवहार संभव है ।
- # राज्यनीति का क्षेत्र अर्थ की सुरक्षा से अधिक संबद्ध होने के कारण इसका संबंध भौतिक वस्तुओं से अधिक है । अतः इसका धर्मनीति के आश्रय में होना अनिवार्य व अपरिहार्य है ।
- ● अंतर्राष्ट्रीय नीति से राष्ट्रीय नीति को प्रेरणा व दिशा, राष्ट्रीय नीति से सामाजिक नीति को प्रेरणा व दिशा, सामाजिक नीति से पारिवारिक नीति को प्रेरणा व दिशा और पारिवारिक नीति से मानवीयतापूर्ण आचरण के लिए प्रेरणा व दिशा प्राप्त होती है ।
- ● इसकी भिन्न पद्धति से भी नीति निर्धारण होता है, जिससे कि मानव समाज के लिये व्यक्ति की महत्ता तथा व्यक्ति के लिए मानव समाज की महत्ता प्रतिपादित होती है । इसके साथ ही व्यक्ति से लेकर संपूर्ण मानव समाज की एकसूत्रता का महत्व भी हृदयंगम होता है ।
- ● जागृति विधि से अंतर्राष्ट्रीय नीति में अखंडता व सार्वभौमता की नीति, राष्ट्रीय नीति में विधि (न्याय) की अक्षुण्णता बनाए रखने के लिए व्यवस्था, सामाजिक नीति में स्वधन, स्वनारी/स्वपुरुष तथा दया पूर्ण कार्य-व्यवहार की नीति और व्यक्तिगत जीवन में समझदारी संपन्न नीति से ही पोषण संभव है ।
- # संबंध एवं सम्पर्क के विषय में एक बात स्पष्ट कर देना आवश्यक है । इन दोनों में दायित्व का निर्वाह आदान प्रदान के आधार पर होता है परन्तु दोनों में भेद यह है कि संबंध की परस्परता में प्रत्याशाएं पूर्व निश्चित रहती है तथा इसके अनुरूप ही आदान प्रदान होता है । सम्पर्क में आदान एवं प्रदान परस्परता में पूर्व निश्चित नहीं रहता । इसलिए सम्पर्क में आदान व प्रदान क्रियाएं ऐच्छिक रूप में अवस्थित है । संबंध दायित्व प्रधान एवं सम्पर्क कर्तव्य प्रधान है । सम्पर्क में परस्परता में स्वधन, स्वनारी/स्वपुरुष दयापूर्ण कार्य व्यवहार की अपेक्षा रहती ही है । मानव अथवा इससे
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द