• प्रेम :- दिव्य मानव, देव मानव की सान्निध्यता, सामीप्यता, सारुप्यता तथा सालोक्यता प्राप्त करने हेतु अंतिम संकल्प की ‘प्रेम’ संज्ञा है । दया, कृपा, करूणा की संयुक्त अभिव्यक्ति ही प्रेम है ।
  • सहजता :- जागृति सहज मानसिक, वैचारिक, चिंतन स्थिति में संगीत है, उसकी ‘सहजता’ संज्ञा है ।

:- रहस्यता से रहित जो मानसिक स्थिति है उसकी सहजता संज्ञा है ।

  • सरलता :- जागृति सहज स्वभावपूर्ण व्यवहार की ‘सरलता’ संज्ञा है । कायिक, वाचिक, मानसिक रूप में नियमों को वचन पूर्वक प्रमाणित करना ।

:- आडम्बरहीनता अथवा दिखावा रहित व्यवहार की सरलता संज्ञा है ।

  • आनंद :- सहअस्तित्व में अनुभूति की ‘आनंद’ संज्ञा है ।
  • पूर्णता :- सर्वतोमुखी समाधान संपन्नता ही ‘पूर्णता’ है ।
  • निर्भ्रमता :- न्याय, धर्म एवं सत्यतापूर्ण व्यवहार, भाषा, भाव, बोध, संकल्प व अनुभूति की ‘निर्भ्रमता’ संज्ञा है ।
  • # विचार का प्रतिरूप ही भाव, भाषा एवं व्यवहार के रूप में परिलक्षित होता है ।
  • # न्याय, धर्म एवं सत्यानुभूति योग्य क्षमता से व्यवहार, भाव व भाषा संयमित और परिमार्जित होता है ।
  • पवित्र विचार ही मनोबल, मनोबल ही कर्त्तव्य निष्ठा, कर्त्तव्य निष्ठा ही समाधान-समृद्धि, समाधान-समृद्धि ही सहअस्तित्व तथा सहअस्तित्व ही पवित्र विचार है, जिससे न्यायवादी व्यवहार प्रतिष्ठित है अन्यथा अवसरवादी व्यवहार अप्रतिष्ठित है ।
  • अवसरवादिता पर ही संयमता, नियंत्रण तथा सुधार का अधिकार जागृति पूर्वक प्रमाणित होता है ।
  • प्रत्येक मानव जन्म से ही न्याय का याचक है । न्यायपूर्ण व्यवहार प्रस्तुत करने योग्य क्षमता, योग्यता एवं पात्रता को उत्पन्न करना ही, एक से अनेक मानव द्वारा किए जा रहे अनवरत प्रयास का मूल उद्देश्य है ।
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