प्रकाशन तथा प्रदर्शन अनिवार्य है, जिससे भ्रामकता का तथा विलासिता का ही प्रचार होता है, जो मानव कुल को असंतुलित, व्याकुल तथा त्रस्त किये हुए हैं ।
- ● मानव गलती करने का अधिकार लेकर तथा सही करने का अवसर एवं साधन लेकर जन्मता है ।
- ● उपरोक्तानुसार मानव को न्यायवादी बनाने हेतु तथा न्याय में निष्ठा उत्पन्न करने हेतु उसे स्वभाववादी बनाने के लिए व्यवस्था व शिक्षा संस्कार का योगदान आवश्यक है ।
- ● भ्रांति ही अवसरवादिता में आसक्ति का कारण है । भ्रांति मात्र आरोप ही है ।
- ● भ्रांति के विपरीत में निर्भ्रमता है । निर्भ्रमता ही न्याय का कारण है । निर्भ्रमता के फलस्वरूप समाधान, मनोबल, सुख, कर्त्तव्य में निष्ठा, स्नेह, अनुराग, शांति, संतोष, प्रेम, सहजता, सरलता, उत्साह, आह्लाद तथा आनंद सहज उपलब्धि है । यह सब अनन्य रूप में संबद्ध हैं ।
- ⁘ समाधान :- क्यों, कैसे की पूर्ति अथवा क्रिया से अधिक ज्ञान की ‘समाधान’ संज्ञा है ।
- ⁘ मनोबल :- केन्द्रीकृत मन:स्थिति अर्थात् समझदारी को प्रमाणित करने में मनोयोग स्थिति की ‘मनोबल’ संज्ञा है ।
- ⁘ सुख :- न्याय में दृढ़ता की ‘सुख’ संज्ञा है ।
- ⁘ कर्त्तव्य में निष्ठा :- उत्तरदायित्व का वहन ही कर्त्तव्य में निष्ठा है ।
- ⁘ स्नेह :- न्याय, धर्म एवं सत्य की निर्विरोधिता ही ‘स्नेह’ है ।
- ⁘ अनुराग :- निर्भ्रमता से प्राप्त आप्लावन की ‘अनुराग’ संज्ञा है ।
- ⁘ शांति :- वेदना विहीन वैचारिक स्थिति ।
- ⁘ संतोष :- अभाव का अभाव (समृद्धि, समाधान) अथवा अभाव से अभावित चित्रण विचार सम्पन्नता ।