• # उपरोक्त वर्णित उद्देश्य अर्थात् तन, मन और धन के सदुपयोग और तन, मन और धन की सुरक्षा की पूर्ति के लिए तथा तदनुकूल आचरण को व्यवहार में लाने हेतु और तदनुसार विभिन्न स्तरों के गठन की संपर्कात्मक तथा संबंधात्मक परस्परता को विश्वासपूर्वक सुदृढ़ करने के लिये एक समन्वित धर्मनीति तथा राज्य नीति आवश्यक है, जिससे एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था को स्थापित तथा विकसित किया जा सके, जो मानव के जागृति की संपूर्ण संभावनाओं से युक्त हो । ऐसी व्यवस्था मात्र पोषण-प्रधान गुणों व नीतियों से ही संपन्न होगी, जो जागृति का मार्ग प्रशस्त करेगी, जिससे मानव सुखी रहेगा ।
  • # उपरोक्तानुसार धर्मनीति तथा राज्यनीति के व्यवहारान्वयन में सहायक सभी विचार तथा व्यवहार पोषक, अन्यथा में शोषक ही सिद्ध होंगे ।
  • # वातावरण के दबाव से मुक्त होने के लिए शोषण से मुक्ति आवश्यक है, जो सहअस्तित्व में अनुभवपूर्वक सर्वतोमुखी समाधान से ही मानव में प्रमाणित है ।
  • # मध्यस्थ दर्शन, सहअस्तित्ववाद के प्रकाश में संपूर्ण मानव समाज के लिए समन्वित धर्मनीति तथा राज्यनीति निम्न आधारभूत सिद्धांतों की सहायता से की गयी है ।
  • 1. भूमि एक (अखण्ड राष्ट्र) राज्य अनेक

2. मानव जाति एक कर्म अनेक

3. मानव धर्म एक समाधान अनेक

4. सत्ता (व्यापक रूप में) देवता अनेक

  • उक्त चार सिद्धांतों से एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्वयंसिद्ध सूत्र की निष्पत्ति होती है, वह है:-
  • मानव जाति सही में एक तथा भ्रमवश गलती में अनेक है । अनेक (परस्पर विरोध) होने का कारण रहस्य और उपभोक्तावाद ही है । जागृति पूर्वक सभी अनेक परस्पर पूरकता, उपयोगिता विधि से एक हो जाते हैं ।
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