- # 2. पति-पत्नी संबंध :-
- ⁕ दाम्पत्य जीवन की चरम उपलब्धि ‘एक मन और दो शरीर होकर’ व्यवहार करना है । दाम्पत्य जीवन में व्यवहार निर्वाह संपर्क एवं संबंध ही है । तात्पर्य यह है कि दाम्पत्य जीवन व्यक्ति के रूप में दो है और व्यवहार के रूप में एक हैं ।
- ⁕ एक मन और दो शरीर अनुभव करने के लिए दोनों पक्षों द्वारा निर्विरोध पूर्वक अपने संबंध एवं संपर्क का निर्वाह करना ही अवसर, आवश्यकता तथा उपलब्धि है । जहाँ तक मान, सम्मान, प्रतिष्ठा, आदर और यश का प्रश्न है, वह पति अथवा पत्नी दोनों में सम्मिलित रूप से रहता है तथा उनमें से किसी एक को भी मिलने पर दूसरे पक्ष में वह समान रूप में बंटता ही है और इसकी स्वीकृति भी है । पति-पत्नी के रूप में दो शरीर एक मन होने का यही प्रमाण है ।
- ⁕ परस्परता रूपी सभी संबंधों में विश्वास मूल्य सदा-सदा होना परमावश्यक है । यही मूल मुद्दा है संबंधों को पहचानने का । सभी संबंध अथवा स्थापित संबंध पहचान में होने के उपरांत शरीर काल तक निर्वाह होने की बात आती है । यही जागृत मानव परंपरा का प्रमाण है । संबंधों में से एक महत्वपूर्ण संबंध पति-पत्नी संबंध है । इस संबंध में परस्परता में मूल्यों का पहचान इस प्रकार से होता है कि विश्वास पूर्वक सम्मान, स्नेह व प्रेम मूल्यों का निरंतर अनुभव होता है या समय-समय पर होता है । न्यूनतम विश्वास मूल्य बना ही रहता है । प्रेम मूल्य; दया, कृपा, करुणा की अभिव्यक्ति है । इस विधा में पति में मूल्यांकन के आधार पर दया, कृपा, करुणा मूल्यों का स्पष्ट होना, उसी प्रकार से पत्नी द्वारा भी इन मूल्यों का स्पष्ट होना ही प्रेम मूल्य है । वास्तविक रूप में पात्रता के अनुसार वस्तु का मूल्यांकन, पात्रता के अनुसार योग्यता का मूल्यांकन, योग्यता के नसार पात्रता का मूल्यांकन परस्परता में होना स्वाभाविक क्रिया है । यह नित्य नैमित्यिक है । नित्य मूल्यांकन का तात्पर्य हम मूल्यांकन में अभ्यस्त हो गये हैं । नैमित्यिक का तात्पर्य-प्रयत्न पूर्वक ध्यान पूर्वक मूल्यांकन करने से है । ऐसी स्थिति बारंबार होते-होते मूल्यांकन सहज रूप से होना पाया जाता है । इस प्रकार योग्यता के अनुसार पात्रता, पात्रता के अनुसार योग्यता का मूल्यांकन विशेषकर पति-पत्नी संबंध में होना अति आवश्यक है । ये दोनों मूल्यांकन के साथ ही पात्रता और योग्यता में संतुलन स्थिति को पाया जाता है । तीसरी विधि से
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द