स्थिति की निरंतरता देने वाली वस्तु विश्वास ही है । अस्तु, इसमें विश्वास की स्थिरता प्रदान किया रहना ही इस संबंध की अंतिम अनुभूति है ।

  • # 6. समझदार मानव परंपरा में व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी का संबंध:-
  • मानवत्व सहित व्यवस्था में विधि समायी रहती है । विधान निर्वाह रूप में प्रमाणित होता है । व्यवस्था का धारक-वाहक जागृत मानव ही होता है । व्यवस्था में भागीदारी करने के लिए मानव को जागृत होना रहना आवश्यक है । जागृति पूर्वक ही हर नर-नारी जानने, मानने, पहचानने, निर्वाह करने का प्रमाण प्रस्तुत करता है ।
  • साधक द्वारा साध्य की उपलब्धि की संभावनाओं के अनुरूप फल मिलने पर निर्णय होता है कि साधना सही दिशा में गतिशील है । संभावनायें सुदृढ़ होने पर मान्यताओं के रूप में अवतरित होती है । सभी मान्यतायें विकास अर्थात् जागृति तथा व्यवहार के लिए है ।
  • विकास के लिए जो मान्यतायें हैं वे अंतरंग में अभ्यास एवं जागृति के लिए प्रेरणा स्त्रोत तथा बहिरंग में सामाजिकता तथा व्यवसाय के लिए प्रेरणा स्त्रोत है ।

सामाजिक दायित्व का प्रमाण हर समझदार परिवार में समाधान, समृद्धिपूर्वक जीने में प्रमाणित होता है । यह क्रमशः सम्पूर्ण मानव का एक इकाई के रूप में पहचान पाना बन जाता है । पहचानने के फलन में निर्वाह करना बनता ही है । ऐसी निर्वाह विधि स्वाभाविक रूप में मूल्यों से अनुबंधित रहता ही है । यही व्यवस्था में भागीदारी की स्थिति में परिवार व्यवस्था से अन्तर्राष्ट्रीय या विश्व परिवार व्यवस्था तक स्थितियों में भागीदारी की आवश्यकता रहता ही है । ऐसे भागीदारी के क्रम में मानव अपने में, से समझदारी विधि से प्रस्तुत होना बनता है । समझदारी विधि से ही हर नर-नारी व्यवस्था में भागीदारी करना सुलभ सहज और आवश्यक है । इसी क्रम से मानव लक्ष्य प्रमाणित होते हैं जो समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व के रूप में पहचाना गया है, इसे प्रमाणित करना ही मानवीयता पूर्ण व्यवस्था है ।

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