पति या पत्नी अथवा दोनों में योग्यता, पात्रता हो ही नहीं, यह दाम्पत्य जीवन अथवा किसी भी प्रौढ़/युवा में संभव ही नहीं है । यही हो सकता है कि योग्यता और पात्रता का न्यूनातिरेक हो सकता है । इसी में सामंजस्य को पाने के लिए दाम्पत्य जीवन का महती उपयोग होना पाया जाता है । इन तथ्यों को, पूर्व आशयों को भुलावा देना ही दु:ख और परेशानी का कारण है । यही भ्रम है ।

  • # 3. गुरु और शिष्य संबंध :-
  • गुरु की ओर से शिष्य के प्रति आशा बंधी रहती है कि जो अध्ययन कराया जाता है, उसका बोध शिष्य को होगा । शिष्य कृतज्ञ व आज्ञाकारी होगा ।
  • शिष्य की गुरु से प्रत्याशा रहती है कि उसकी वांछा तथा जिज्ञासा के आधार पर उन्हीं दिशाओं में गुरु द्वारा अध्ययन कराया जाएगा । गुरु और शिष्य दोनों में उपलब्धि की कामना की साम्यता है । प्रक्रिया में पूरकता है । एक प्रदाता है और दूसरा प्राप्तकर्त्ता है। प्राप्तकर्त्ता और प्रदाता की एक ही अभिलाषा है कि ‘बोध’ पूर्ण हो जाये ।
  • शिष्य का अर्थ बोध जब पूर्ण हो जाता है, उस समय गुरु पर्व मनाता है अर्थात् गुरु को प्रसन्नता की अनुभूति होती है, यही वात्सल्य स्थिति है । तात्पर्य यह है कि हर एक बड़े अपने से छोटों में वांछित गुणों की प्रसारण क्रिया में तत्पर रहते हैं । इसके बदले में जो तोष (उत्सवित होना) वे पाते हैं, वही इसकी उपलब्धि है । प्रदाय के बदले में किसी भौतिक वस्तु की प्राप्ति की अभिलाषा नहीं रहती ।
  • शिष्य का गुरु के साथ विश्वास सहित पहचान किया रहना सहज है । यह स्वाभाविक मिलन है । योग, मिलन के रूप में स्पष्ट होता है । गुरु-शिष्य का योग अपने में जागृति के आकाँक्षा पूर्वक कार्य-व्यवहार और अध्ययन करना, क्योंकि गुरु ही अध्ययन कराने वाला होना सुस्पष्ट है । अध्ययन कराने के क्रम में सदा-सदा शिष्य द्वारा ग्रहण करने की अपेक्षा व विश्वास समाया रहता है । उसमें जितने भी शिष्य सार्थक होते हैं, गुरु में प्रसन्नता का स्रोत समाया रहता है, यह स्पष्ट हो चुका है । यही गुरु-शिष्य के परस्परता में सफलता का प्रमाण है । जैसे-जैसे शिष्य का आकाँक्षा और जिज्ञासा शांत होता है, वैसे ही सभी संशय दूर होते जाता है । ऐसे संशय मुक्ति विधि से गौरव,
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