• # 7. मित्र सम्बन्ध :-
  • समाधान, समृद्धि सहज समानता ही मित्र संबंध है एवं सर्वतोमुखी समाधान में सहभागिता हो उसकी ‘मित्र’ संज्ञा है ।
  • जिसमें बैर का अभाव हो उसकी मित्र संज्ञा है ।

इस सम्बन्ध में यह आवश्यक है कि एक पक्ष यदि किसी विपरीत घटना या परिस्थिति से घिर जाए तो दूसरा पक्ष अपना पूरा तन, मन और धन व्यय करने के लिए तथा मित्र को उस घटना-विशेष अथवा परिस्थिति विशेष से उबारने के लिये प्रयत्नशील हो जाये । यही मित्रता की चरम उपलब्धि है । घटना ग्रस्त या परिस्थिति ग्रस्त मित्र की जो कठिनाइयाँ है, वह पूरी की पूरी दूसरे मित्र को प्रतिभासित होती है । मित्रता की कसौटी ही यह है कि परस्पर की कठिनाइयों को दूसरा पक्ष सटीक स्वीकार लेता है और यदि उसका परिहार है, तो उसके लिये अपनी शक्तियों को नियोजित करता है ।

  • मित्रता की निरंतरता न्याय पूर्ण व्यवहार से ही सफल होती है । निर्वाह के इन समस्त सम्बन्धों से व्यष्टि से समष्टि तक पोषक अन्यथा शोषक सिद्ध है । मित्र-मित्र सम्बन्ध की परस्परता में विश्वास, सम्मान व स्नेह मूल्य प्रधान है एवं प्रेम संबंध भावी रहता है।
  • विधि का अर्थ है मानव में निहित अमानवीयता का शमन तथा जागृति का मार्ग प्रशस्त करना । व्यवस्था का तात्पर्य है मानवीयता की स्थापना के लिए प्रोत्साहन योग्य अवसर व साधन को उपलब्ध कराने की सामर्थ्य अर्जित करना ।
  • # मानव के लिए सुख ही धर्म है । सुख की आशा से ओतप्रोत मानव को एक क्षण के लिए भी इस कामना से विमुख नहीं किया जा सकता । धर्म की परिभाषा ही इस प्रकार की गई है कि “जिससे जिसका वियोग न किया जा सके, अथवा जिसका वियोग सम्भव न हो, वह उसका धर्म है ।” धर्म की इसी परिभाषा के आधार पर पदार्थ का धर्म ‘अस्तित्व’, अन्न व वनस्पति का धर्म ‘पुष्टि’, जीवों का धर्म ‘जीने की आशा’ और मानव का धर्म ‘सुख’ प्रतिपादित किया गया । यह भी प्रतिपादित किया गया कि हर विकसित अवस्था की इकाई में अविकसित इकाई का धर्म विलय रहता ही है ।
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