• चार अवस्थाओं की सृष्टि का वर्णन पूर्व में किया जा चुका है । इसमें पदार्थावस्था का धर्म अस्तित्व तथा ज्ञानावस्था में सुख धर्म सिद्ध हुआ है । अस्तित्व का अभाव किसी भी काल में नहीं है, ऐसा निरीक्षण, परीक्षण तथा सर्वेक्षण से सिद्ध हो चुका है । अस्तित्व की कल्पना पदार्थ के अभाव में सिद्ध नहीं होती । साथ ही पदार्थ के ससीमित होने के कारण इसकी सर्वव्यापकता भी सिद्ध नहीं होती ।
  • # सुख एक वैचारिक तथ्य है । बुद्धि के अभाव में विचार तथा ज्ञान के अभाव में बुद्धि की क्रियाशीलता सिद्ध नहीं है । सुख, सृष्टि सहज सर्वोत्कृष्ट सृजन मानव इकाई का धर्म है । जहाँ कहीं भी पदार्थ नहीं है, वहाँ मानव को ले जाने पर भी सुखधर्मिता का अभाव मानव में नहीं पाया गया । इसलिए सुख का आधार ज्ञान सम्पन्नता सार्वदेशिक सिद्ध हुआ, क्योंकि जो नहीं है, उसकी उपलब्धि संभव नहीं है । इस प्रकार ज्ञान सर्व-व्यापक सिद्ध हुआ । ज्ञान ज्ञाता द्वारा ज्ञेय सहित मानव परम्परा में प्रमाणित होता है । सर्वमानव ज्ञाता होने योग्य हैं ही ।
  • सहअस्तित्व में अनुभव ही पूर्ण ज्ञान है ।
  • # इस प्रकार अस्तित्व तथा ज्ञान (व्यापक) का अभाव किसी देश-काल में संभव नहीं पाया जाता है तथा ज्ञान का अभाव किसी भी देश व काल में भी नहीं पाया जाता । ज्ञान सर्वदेश काल में समीचीन है । अतः ज्ञान रहता ही है लेकिन ज्ञान का उद्घाटन जागृत मानव के द्वारा होता है ।
  • इस रीति से पदार्थ अनादि तथा ज्ञान भी व्यापक सिद्ध है ।
  • उपरोक्त संदर्भ में यह स्पष्ट हो जाना आवश्यक है कि पदार्थावस्था में संगठन और विघटन की जो प्रक्रिया पाई जा रही है, वह संकेत देती है कि समूह का होना, समूह की ओर पदार्थों का आकर्षित होना, उनका घनीभूत होना इस प्रकार से आकर्षण का नियम सिद्ध है ।
  • ठीक इसी प्रकार प्राणावस्था में समूह के साथ-साथ पुष्टिकरण पूरकता के अर्थ में प्रक्रिया भी परिलक्षित हो रही है, यथा- एक प्राणकोशा अनेकानेक खनिज-द्रव्यों को एकत्रित कर देता है और साथ ही उनमें रचना भी सिद्ध कर देता है । इससे हमें यह प्रेरणा मिलती है कि अस्तित्व के लिए हर प्राणी अपने ढंग से पूरकता रचना एवं उपयोग में व्यस्त है तथा उसमें कुलीनता के प्रति तीव्र निष्ठा या अक्षुण्ण निष्ठा भी सिद्ध होती है ।
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