• मानव सुख धर्मी है । समाधान =सुख । समस्या =दु:ख ।
  • मानव द्वारा प्राप्त कर्तव्यों का, सुख के पोषणवादी रीति व नीति का पालन करना ही धर्म नीति है ।
  • मानव द्वारा सामाजिक एवं प्राकृतिक नियमों के अनुसार व्यवहार की “पोषणवादी रीति” तथा बौद्धिक नियमों के अनुसार विचार एवं आचरण की ‘व्यवहार नीति’ संज्ञा है ।
  • # व्यवहारिकता में रीति का पालन होते तो देखा जाता है, पर नीति का पालन होते हुये भी और नहीं होते हुए भी पाया जाता है ।
  • नीतिपूर्ण विचार का अभाव ही शोषण का कारण है, जो अंततोगत्वा स्व-पर दु:ख कारक होता है ।
  • परिवार, समाज तथा व्यवस्था दत्त भेद से कर्त्तव्य को स्वीकारने तथा इसे निष्ठा, नियम एवं सत्यतापूर्वक पालन करने पर ही मानव में विशेष प्रतिभा का विकास हर स्तर पर है अर्थात् पारिवारिक, सामाजिक तथा व्यवस्था के साथ सफलताऍँ इसके विपरीत स्थिति में प्राप्त प्रतिभा तथा सफलता भी निरस्त होती है ।
  • दूसरे का प्रभाव परस्परता की आवश्यकता तथा अवस्था पर निर्भर करता है । आवश्यकता तथा अवस्था का प्रादुर्भाव जागृति क्रम के अनुसार है ।
  • पदार्थ का विकास एवं उसकी अवस्था उस इकाई की गति, श्रम तथा परस्परता के दबाव पर निर्भर करती है जिससे संगठन, विघटन तथा परिणाम होता है ।
  • संगठन एवं विघटन भेद से रूप, रूप भेद से विकास, विकास भेद से क्षमता, क्षमता भेद से माध्यम, माध्यम भेद से अवस्था, अवस्था भेद से आवश्यकता, आवश्यकता भेद से चेष्टा, चेष्टा भेद से प्रगति, प्रगति भेद से फल-परिणाम, फल-परिणाम भेद से योग व वियोग और योग व वियोग भेद से ही संगठन एवं विघटन और समाधान एवं समस्या है ।
  • जीवन को जागृति के लिए माध्यम के रूप में मानव शरीर उपलब्ध है ।
Page 57 of 219
53 54 55 56 57 58 59 60 61