- ● जागृति व ह्रास भेद से ही मानव का मनाकार भेद होता है ।
- ● आसक्ति एवम् यथार्थ (अनासक्ति) भेद से ही मानव की मनः स्वस्थता की आशाएँ हैं ।
- ● आशाएँ भ्रम मुक्ति पूर्वक सार्वभौम व्यवस्था अर्थ एवम् काम के रूप में प्रलोभन, प्रत्याशा भेद से दर्शन (शास्त्र); स्वीकृत व अनुकरण भेद से काव्य; जिस कार्य, विचार व व्यवहार से क्लेशोदय हो वह निषेध तथा जिससे सुखोदय होता है, यही विधि के रूप में स्वीकारी जाती है ।
- ● प्राकृतिक एवम् कृत्रिम वातावरण मानव के लिए अनुकूल या प्रतिकूल होता है ।
- ● मानव में आशाएँ अमानवीय, मानवीय व अतिमानवीय अवस्था भेद से हैं ।
- ● प्रवृत्ति व निवृत्ति (बंधन एवम् मोक्ष के स्पष्टीकरण) भेद से शास्त्र, विहिताविहित भेद से आशाएँ, विचार, इच्छा एवम् ऋतम्भरा है, जिसकी विवेचना, अध्ययन व प्रयोग करने का अवकाश एवम् अवसर केवल मानव में है ।
- ● जड़ वस्तु में मात्र स्थिति-गति होना रहना पाया जाता है ।
- ● समस्त जड़ क्रिया में परमाणुओं को क्रियाशील रहना पाया जाता है े। परमाणुएं समूह के रूप में अथवा संगठित रूप में क्रियाशील मध्यांश तथा आश्रित अंशों सहित क्रिया के रूप में परिलक्षित होता है । इसलिए ज्ञात होता है कि जड़ पदार्थ में क्रियाशीलता स्वतंत्र है ।
- ● जब एक परमाणु विकासपूर्वक चैतन्य हो जाता है, उसी समय से जीने की आशा बन्धन स्वरूप पाई जाती है । यह इससे सिद्ध होता है कि हर जीव जीना चाहता है ।
- ● मानव बुद्धिजीवी, विचारशील होने के कारण, विचार, इच्छा, अहंकार अथवा संकल्प का प्रयोग वृत्ति, चित्त तथा बुद्धि द्वारा करता है ।
- ● वृत्ति का बंधन विचार का बन्धन है, जो स्वविचार को श्रेष्ठ मानने से है तथा इससे अमानवीय विचार का प्रसव होता है क्योंकि मानव कल्पनाशील है ।
- ● न्याय पूर्ण विचार से आशा बन्धन एवं विचार बन्धन से मुक्ति होती है ।
- ● चित्त का बन्धन इच्छा का बन्धन है, जो स्वयं द्वारा किए गए चित्रण को श्रेष्ठ (भ्रमवश चिन्तन) मानने से होता है । इससे अमानवीयता का पोषण तथा चिन्ता का जन्म होता है ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द