- ● रचना विरचना पर्यन्त जड़ प्रकृति संज्ञा है एवम् वर्तमान से पहले जिसका निर्माण हो चुका है, उसका अध्ययन तथा भविष्य में जिसके निर्माण की सम्भावना है, उसका अनुमान मानव ने किया है । सम्पूर्ण रचना को जड़ प्रकृति संज्ञा है ।
- ● नियम, प्रक्रिया और फल का संयुक्त प्रमाण ही सिद्धान्त है, क्योंकि समाधान पूर्वक नियम एवम् प्रक्रिया के अभाव में किसी भी क्रिया एवं फल का दर्शन सिद्ध नहीं है । क्रिया के नियम एवम् प्रक्रिया प्रयोजन के बोध से ही वैचारिक परिमार्जन अर्थात् समाधान सम्भव हो सका है ।
- ⁘ भूगोल :- मानव और मानवीयता के अर्थ में पृथ्वी का सर्वेक्षण, निरीक्षणपूर्वक मानचित्र सहित रचना (ज्ञान पाने) के लिये सम्पादित अध्ययन की भूगोल संज्ञा है ।
- ⁘ सुसंस्कृत संस्कार :- विधि मानव चेतना, देव चेतना एवम् दिव्य चेतना क्रम में है । विधि में जो विश्वास है, उसकी सुसंस्कृत सुसंस्कार संज्ञा है ।
- ● मानवीयतापूर्ण प्रवृत्ति एवम् व्यवहार की न्याय तथा अमानवीय प्रवृत्ति एवम् व्यवहार की अन्याय संज्ञा है ।
- ● यथार्थ बोध के पश्चात उसके प्रति उत्पन्न दृढ़ता की विश्वास संज्ञा है ।
- ⁘ न्यायपूर्वक की गई कृति की सुकृति तथा अन्यायपूर्वक की गई कृति की दुष्कृति संज्ञा है ।
- ● मानवीयता के लिये आवश्यक नियम ही न्याय है, जिससे ही मानवीयता का संरक्षण एवम् संवर्धन सिद्ध है ।
- ● मानव के व्यवहार का नियंत्रण न्याय से, वैचारिक संयमता धर्म से तथा अनुभव मात्र सत्य से सम्पन्न है ।
- ● नियम से ही नियंत्रण है । स्वीकारने योग्य लक्ष्य से ही धारणा है एवम् जिसमें परिणाम नहीं है ही सत्य है ।
- ● मानव ने स्वीकारने योग्य तथ्य एवम् लक्ष्य सुख को जन्म से ही स्वीकार कर लिया है ।
- ● स्थूल व सूक्ष्म भेद से ही विकृति अथवा सुकृति है । विज्ञान व विवेक के अध्ययन एवम् प्रयोग से विकास (जागृति) तथा अज्ञान एवं अविवेक से ही हास है ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द