- ● धर्म पूर्ण चिन्तन से अथवा चित्रण से इच्छा बन्धन से मुक्ति होती है ।
- ● भ्रमित मानव मान्यता पूर्वक चित्रण क्रिया से स्वयं को श्रेष्ठ मानने से इच्छा बन्धन होता है। यही अभिमान है ।
- ● सत्य बोध से परिपूर्ण संकल्प से भ्रम मुक्ति होती है ।
- ● लोकासक्ति से (जड़ पक्ष से) विषय सुख फलस्वरूप दुःख एवं समस्या तथा आत्मबोध से सहज सुख की निरन्तरता है ।
- ● लोक परिणाम वादी है, अतः उसका सुख भी क्षणिक है । इसलिए लोकासक्ति बन्धन का कारण है ।
- ● आत्मबोध अमर है व अपरिणामी है, इसलिए आत्मबोध का सुख शाश्वत है । आत्मबोध का तात्पर्य अनुभव बोध से है ।
- ● अतः यह सिद्ध होता है कि जिसमें सुख की निरन्तरता नहीं है, उसी में सुख पाने का प्रयास ही बन्धन है तथा जिसमें सुख स्वभाव है उसका अनुभव ही मोक्ष है ।
- ● भ्रमित इच्छा की पूर्ति के लिए क्रिया तथा क्रिया की पूर्ति के लिए भ्रमित इच्छा निरंतर व्यस्त है, जिसकी पूर्ति नहीं है । इच्छा एवम् क्रिया के सम्मिलित स्वरूप की ‘लोक’ संज्ञा है ।
- ● जिसकी पूर्ति नहीं है, जो पूर्ण नहीं है, उसकी पूर्ति के प्रति और पूर्णता के प्रति जो हठवादी इच्छाएं हैं उसकी ‘मृगतृष्णा’ तथा भ्रान्ति संज्ञा है, जो बन्धन है ।
- ● मृगतृष्णा अथवा भ्रान्ति का निराकरण सहअस्तित्ववादी दर्शन से ही संभव है ।
- ● इकाई का ही दर्शन है और इसके लिए इकाई के रूप, गुण, स्वभाव और धर्म का अध्ययन अनिवार्य है ।
- ● संपूर्ण सृष्टि का कुल अध्ययन जड़, चैतन्य तथा व्यापकता के संदर्भ में ही है । यही भौतिक, रासायनिक एवं जीवन क्रिया के रूप में स्पष्ट है ।
- ● संपूर्ण सृष्टि का अध्ययन मानव ने कुल छः दृष्टिकोणों से किया है :-
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द