के अर्थ में और विकर्षण समस्या के साथ होता है । आकर्षण, प्रत्याकर्षण क्रिया के साथ जीवन में कम्पनात्मक गति वर्तमान रहती ही है । जीवन परमाणु में कम्पनात्मक गति पाँच अक्षय बल एवं शक्ति के रूप में प्रकट रहती है ।
- ● प्रत्याकर्षण और आकर्षण से वर्तुलात्मक गति है । जड़-चैतन्य परमाणुओं में परिवेशों में घूर्णन व वर्तुलात्मक गति बनी रहती है । मध्यांश में केवल घूर्णन गति बनी रहती है ।
- ● मेधस पर कंपन-प्रदत्त तरंग से ज्ञान का उद्घाटन ज्ञानेन्द्रियों द्वारा होता है ।
- ● जीवन द्वारा संकेत रूपी गति-प्रदत्त तरंग से संवेदनशीलता और संज्ञानशीलताएँ व्यवहार में स्पष्ट होते हैं ।
- ● प्राण और मन के संयुक्त (विवशतापूर्ण आघात) प्रेरणा रूपी कंपन से संवेग है, अथवा इसे ऐसा समझें कि संवेग मन के प्रभाव से संपन्न प्राणवायु-तरंग है, जिससे इंद्रिय-ज्ञान या क्रियाएँ संपन्न होती हैं ।
- ● हर जड़ क्रिया से प्राप्त जो स्वीकृति पक्ष है, वह मन का है, जिसके लिए विह्वलता-पूर्वक की गई क्रिया के बदले में पाई गई उपलब्धियाँ सुख एवं दु:ख हैं ।
- ● जागृत मानव के मनाकृति से उत्पादन रूपी कृतियाँ, कृतियों से उपयोगी आकृति, उपयोगी आकृतियों से कुशलता/निपुणता का प्रमाण, कुशलता/निपुणता से सम्वेग, सम्वेग से समाधान, समाधान से परिस्थितियाँ, परिस्थिति से अभ्युदय, अभ्युदय से योग, योग से सुख, शांति, संतोष; सुख, शांति, संतोष ही रत्यात्मक रति, रत्यात्मक रति ही मन: स्वस्थता तथा मन:स्वस्थता ही निर्भ्रमता है । जागृत मानव उपरोक्त क्रम विधि से प्रमाणित होता है ।
- ⁘ कृति :- विचारानुरूप की गई क्रिया की ‘कृति’ संज्ञा है ।
- ⁘ आकृति :- क्रिया द्वारा अनेक अणु-परमाणु समूहों के संगठित रूप की ‘आकृति’ संज्ञा है ।
- ⁘ मानवीयतापूर्ण तथा अतिमानवीयतापूर्ण विचारों के अनुरूप कार्य की ‘सुकृति’ तथा अमानवीयतावादी विचारों के अनुरूप किये गये कार्य की ‘दुष्कृति’ संज्ञा है ।
- ⁘ आसक्ति :- क्रिया के लिये जो आकर्षण है, उसकी ‘आसक्ति’ संज्ञा है ।
- ⁘ सम्वेग :- जागृति के प्रति उत्कण्ठा की ‘सम्वेग’ संज्ञा है ।