• चैतन्य इकाई में ज्ञान पारदर्शी होने के फलस्वरूप अज्ञान का अभाव हो जाता है, जिससे यथार्थ दर्शन होता है, तथा सर्वत्र ज्ञान ही प्रतिष्ठित परिलक्षित होता है । चैतन्य इकाई के विकास एवं जागृति की यह सीमा ‘निर्भ्रान्त अवस्था’ है ।
  • भ्रमित चैतन्य इकाई ज्ञान में पारभासी होने के फलस्वरूप अज्ञान का पूर्ण अभाव नहीं होता, पर साथ ही साथ ज्ञान का भास होने लगता है, जिससे कभी-कभी यथार्थ का भास भी होता है, तथा कभी-कभी अतिव्याप्ति, अव्याप्ति अथवा अनाव्याप्ति दोष सहित दर्शन होने लगता है । यही ‘भ्रान्त’ अवस्था है ।

अनुभव सम्पन्नता के अनंतर जब तक वित्तेषणा पुत्रेषणा में जीता है, तब तक भ्रांताभ्रांत अवस्था है ।

  • भ्रमित चैतन्य इकाई में ज्ञान के अपारदर्शी होने के फलस्वरूप ही अज्ञान विवशता के रूप में बना रहता है, अर्थात् अतिव्याप्ति, अव्याप्ति या अनाव्याप्ति दोष सहित ही स्वीकृति होती है, यही ‘भ्रान्त’ अवस्था है ।
  • अतिव्याप्ति :- जो जैसा है, उससे अधिक समझना ।
  • अव्याप्ति :- जो जैसा है, उसे वैसा न समझना ।
  • अनाव्याप्ति :- जो जैसा है, उसे उससे कम समझना ।
  • जागृति की परिपूर्णता पारदर्शकता से ही सिद्ध होती है । मानव के लिए यह जागृति ज्ञान की पारदर्शकता से सिद्ध होती है ।
  • आकार, प्रकार, श्वास, प्रश्वास, आस्वादन तथा उत्पादन के एक-सूत्रात्मक तथा विश्रृंखलात्मक भेद से ही क्रियायें परिलक्षित हैं ।
  • भ्रमित मानव में मनाकृति तथा कल्पनात्मक गति की सम्मिलित क्रिया ‘आसक्ति’ है, जिसमें आकर्षण या प्रतिकर्षण समाविष्ट रहता है ।
  • जड़-चैतन्य परमाणु में आकर्षण तथा प्रत्याकर्षण से कंपन है । जड़ प्रकृति में आकर्षण गठन और परमाणु संगठन और अणुरचना के रूप में देखने को मिलता है । आकर्षण-प्रत्याकर्षण विधि से कम्पन होना स्वाभाविक है । भ्रमित चैतन्य प्रकृति में आकर्षण प्रलोभन के रूप में, प्रत्याकर्षण भय के रूप में होता है । जागृत जीवन में आकर्षण समाधान
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