(2) अतिमानवीयता,

(3) अमानवीयता ।

  • # मानवीयता की पोषक दृष्टि, गुण, स्वभाव व विषय वाली इकाई को ‘मानव’ की संज्ञा है । अतिमानवीयता की पोषक दृष्टि, गुण, स्वभाव व विषय वाली इकाई को दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है - (1) देव मानव और (2) दिव्य मानव । अमानवीयता की पोषक दृष्टि, गुण, स्वभाव व विषय वाली इकाईयों को भी दो श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है - (1) पशु मानव और (2) राक्षस मानव ।
  • मानव जागृत; अतिमानव पूर्ण जागृत तथा अमानव अजागृत इकाई है ।
  • शोषण तथा पोषण भेद से ही मानव गुरु-मूल्यन व लघु-मूल्यन प्रक्रिया को संपन्न करता है, जो विकास तथा ह्रास के रूप में परिलक्षित होता है ।
  • लघुत्व का गुरुत्व पर, संकीर्णत्व का व्यापकत्व पर, अल्पत्व का वृहदत्व पर, व्यष्टित्व का समष्टित्व पर, दुर्बल का सबल पर, अक्षम का सक्षम पर, अनाधिकारी का अधिकारी पर आक्रमण पूर्वक अधिकार पाने का प्रयास सफल नहीं होता । तदनुसार अवसरवादिता, न्यायवादिता पर सफल और सिद्ध नहीं है और न होगा ।
  • एक का अनेक द्वारा तथा अनेक का एक द्वारा अनुसरण एवं अनुकूलता केवल न्याय पूर्वक किए गए व्यवहार से ही सफल है, अन्यथा असफल है ।
  • उपरोक्तानुसार ही एक व्यक्ति द्वारा कुटुंब के, एक कुटुंब द्वारा समाज के, एक समाज द्वारा राष्ट्र के, एक राष्ट्र द्वारा विश्व के साथ न्यायसम्मत व्यवहार तथा अनुसरण प्रणाली है । अनुसरण प्रणाली से स्वर्गीयता का अनुभव जागृत मानव परंपरा में ही है । इसके विपरीत क्रम से नारकीयता है । यह इसलिए भी सिद्ध है कि गुरुमूल्य को लघुमूल्य में नहीं समाहित किया जा सकता ।
  • मानवोचित नियम पालन प्रकिया व नीति को अनुकूल तथा इसके विपरीत को प्रतिकूल आचरण की संज्ञा है ।
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