वैविध्यता का मूल कारण है । बौद्धिक वैविध्यता के कारण ही मानव न्यायवादी तथा अवसरवादी व्यवहार अपने जागृति के अनुसार अपनाता है ।
- ● बीज मात्र उद्भव के अनंतर प्रलय (बीज) की ओर तथा प्रलय (बीज) के अनंतर उद्भव की ओर गतिमान है ।
- ● बुद्धि में प्राप्त अनुभवगामी अवधारणाएं (संस्कार) क्रम से विचार व क्रिया में अभिव्यक्ति होती है और क्रिया से प्राप्त विचार पुन: अनुमान सहित अवधारणा (संस्कार) में स्थित होते हैं ।
- # अनुभव मूलक बोध ही धारणा है । यही संस्कार है ।
- ● समस्त मानव की धारणा मात्र ‘विश्राम’ ही है । समस्त श्रम जो है, वह विश्राम के लिए ही है ।
- ● विश्राम योग्य अवधारणा मात्र न्यायपूर्ण व्यवहार से, धर्मपूर्ण विचार से तथा सत्य में अनुभूति सहित सम्भव होता है ।
- ● सत्य के आश्रय में धर्म तथा न्याय है ही ।
- ● न्यायाश्रित मानवीय इकाई (व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र एवं विश्व) द्वारा संपादित समस्त क्रिया तथा व्यवहार मात्र सुकृत परिणाम, परिपाक फल हेतुक (कारण) ही है, जिससे ही समाधान एवं सहअस्तित्व सिद्ध होता है ।
- ● न्यायाश्रित व्यवहार सम्पन्न समाज में मानवीयता तथा अतिमानवीयता की प्रतिष्ठा स्पष्ट है।
- ● उसके विपरीत अवसरवादी व्यवहार से भ्रम एवं अज्ञान से पीड़ित होता है जिससे अमानवीयता का प्रादुर्भाव होता है ।
- ● लघु मौलिकता से गुरु मौलिकता की ओर प्रगति की ‘सुकृत’ और गुरु मौलिकता से लघु मौलिकता की ओर गति को ‘विकृत’ परिणाम, परिपाक एवं फल की ‘हेतुक’ संज्ञा है ।
- ● मानवीय व्यवहार की दृष्टि, स्वभाव एवं विषय के आधार पर सामाजिकता का निम्नानुसार वर्गीकरण किया गया है :-
(1) मानवीयता,