- ● नियम ही न्याय है, न्याय ही ज्ञान है, ज्ञान ही विज्ञान व विवेक है, विवेक एवं विज्ञान ही समाधान है, समाधान ही नित्य सुख एवं पूर्ण है । सत्य ही नियंत्रण है, नियंत्रण ही नियम है ।
- ● रूप, बल, पद एवं बुद्धि वैयक्तिक संपत्ति है । इनकी सफलता इनके सदुपयोग से ही है, जो सामाजिक तथा बौद्धिक नियम पालन से ही संभव है । ये निम्नानुसार है :-
- # रूप का व्यवहार सच्चरित्रता के साथ, बल का व्यवहार दया के साथ एवं बुद्धि का व्यवहार विवेक एवं विज्ञान के साथ संतुलित रूप में प्रतिष्ठित है । यही नियम व न्याय है ।
- ● उक्त व्यवहार न्यायाश्रित होने पर ही सफल है, अन्यथा अवसरवादिता है, जो क्लेश का कारण है ।
- ● जन, धन एवं यश, यह कौटुंबिक और अखंड समाज की संपत्ति है । न्याय सम्मत संबंध निर्वाह की नीति व रीति से, विधि विहित किए गए व्यवसाय, प्रयोग व आविष्कार से तथा अनुसंधान और प्रयोजनार्थ से ही इन संपत्तियों का सदुपयोग सिद्ध हुआ है तथा सफलता मिली है, अर्थात् जन, धन एवं यश का उपयोग कौटुंबिक और अखंड समाज समृद्धि के लिये होना चाहिए, न कि वैयक्तिक । इस प्रकार के न्यायपूर्ण व्यवहार से ही कुटुंब में परस्पर सहयोग, सहकार्य तथा सहअस्तित्व की भावना का विकास संभव है, जिससे परस्परता में विश्वास के प्रति दृढ़ता बनेगी । इस प्रकार अवसरवादी मनोवृत्ति का नाश होगा ।
- ● न्यायवादी व्यवहार से सामाजिक स्तर पर नैतिक मार्ग दर्शन, वैचारिक समाधान योग्य प्रेरणा तथा व्यापक सत्तानुभूति योग्य अध्ययन से अर्थ की सुरक्षा तथा सदुपयोगात्मक नीति का उद्घाटन है । मानवीयता व अतिमानवीयता को बोधगम्य कराने हेतु योग्य अध्यापन और सत्यानुभूति योग्य समाधान व समृद्धि योग्य कर्माभ्यास व परंपरा के पालन हेतु निष्ठा के उद्भव व विकास से सामाजिक जीवन की सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है ।
- ● सफल सामाजिक जीवन व व्यवस्था से व्यक्तियों को अपने विकास हेतु प्रेरणा पाने की अधिक संभावनाएं हैं । लघु मूल्य का गुरु मूल्य की ओर आकृष्ट होना स्वाभाविक ही है और सफल समाज में इस ओर उन्मुख होने के लिए तथा तदनुसार प्रयोग, प्रयास एवं
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द