व्यवसाय तथा अध्ययन के लिए उपयुक्त वातावरण, अवसर व साधन उपलब्ध रहता ही है ।
- ● न्याय ही विधान, विधान ही व्यवस्था, व्यवस्था ही ज्ञान, विवेक, विज्ञान व ज्ञान, विवेक, विज्ञान ही नियम, नियम ही नियंत्रण, नियंत्रण ही न्याय है ।
- ● न्याय, विधान, व्यवस्था, ज्ञान व नियम के लिये प्रेरणा देने तथा इसमें निष्ठा उत्पन्न करने के लिये क्रम से व्यवस्थापक, विधायक, विद्वान, विचारक तथा प्रचारक की उपादेयता अपरिहार्य है ।
- ⁘ व्यवस्थापक :- विधि विधान में पारंगत, नैतिकता का आचरण करने-कराने वाले तथा विपरीत आचरण करने वाले को समझदारी पूर्वक सुधार कर सकने वाले व्यक्ति की व्यवस्थापक संज्ञा है ।
- ⁘ विधायक :- विधि विधान में पारंगत वर्तमान वातावरण एवं पर्यावरण व संतुलन के योग्य स्पष्ट नीति-निर्णय करने वाले विद्वान एवं व्यक्तित्व संपन्न व्यक्ति की ‘विधायक’ संज्ञा है ।
- ⁘ विद्वान :- मानवीयतापूर्ण आचरण सहित, मानव की परस्परता के मध्य में पाये जाने वाली विषमता को समापहरण करने योग्य समाधान का निर्भ्रान्त स्वरूप में अध्ययन कराने वाले व्यक्ति की ‘विद्वान’ संज्ञा है ।
- ⁘ विचारक :- मानवीयतापूर्ण आचरण सहित मानव की परस्परता के मध्य में पाये जाने वाली विषमता को समापहरण करने योग्य समाधान को प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति को ‘विचारक’ की संज्ञा है ।
- ⁘ प्रचारक :- नैतिकता चरित्र एवं मूल्य का, कलापूर्ण ढंग से लोक जन-मानस में, विश्वास उत्पन्न करने वाले को ‘प्रचारक’ की संज्ञा है ।
- ⁘ प्रजा :- नियम सहित मानवीयता पूर्ण आचरण का पालन करने वाले प्रत्येक मानव की प्रजा संज्ञा है ।
- ⁘ विचारक तथा विद्वान ही प्रचारक हो सकते हैं ।