• शासन और शासक भ्रमित मानव प्रवृत्ति की उपज है । शासक के विचारक तथा विचारक के शासक बनने की संभावना नहीं है क्योंकि शासन करते समय मानव को व्यापक विचार करने का तथा व्यापक विचार करते समय शासन करने का अवकाश व अवसर उपलब्ध नहीं है । विचारक सदा-सदा व्यवस्था का पोषक है । शासक सदा-सदा व्यवस्था का शोषक है ।
  • जब व्यक्ति व्यवस्था अर्थात् अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था के अर्थ में समाधान पूर्ण विधि से अपने वैचारिक जीवन की प्रतिष्ठा योग्य क्षमता, योग्यता एवं पात्रता को अर्जित कर लेता है; तब वह व्यवहार पक्ष की समस्याओं के समाधान से युक्त हो जाता है तथा यही इनकी तृप्ति भी है । ऐसे व्यक्ति में क्षोभ का अभाव हो जाता है । यही मानवीयता का वैभव है ।
  • # न्याय पूर्ण व्यवहार को स्वीकारने का अर्थ ही समाधान की उपलब्धि के लिए प्रयास एवं प्रयोगरत होना है । न्यायपूर्ण व्यवहार से समाधान की उपलब्धि निम्न क्रम से होती है ।
  • मानव द्वारा की जाने वाली समस्त क्रियाएं विचार आश्रित है । अत: वैचारिक कुशलता से ही क्रिया की निपुणता, वैचारिक शिष्टता से ही व्यवहारिक कुशलता, व्यवहारिक कुशलता से ही वैचारिक पारंगत्व, वैचारिक पारंगत्व से ही भाव का शिष्ट भाषाकरण संभव है । यथार्थता का अध्ययन ही वैचारिक समाधान है तथा सत्यानुभूति ही आनंद है, जो सफलता की पराकाष्ठा है ।
  • समस्त व्यवसाय मात्र समृद्धि की वांछा से, समस्त व्यवहार परिमार्जित मानव समाज न्याय के पोषण की मूल भावना से, मानवीयता संपन्न समस्त भावपूर्ण भाषा प्रसारण क्रिया को मानव के अभ्युदय एवं विकास की कामना से, सत्यता में ‘अनुभूति व अध्ययन’ मानव ने विश्राम की आकाँक्षा से किया है । विश्राम ही समाधान है ।
  • उत्पादन से अधिक उपभोग, प्रयास एवं प्रवृत्ति समाज शोषक सिद्ध है तथा मात्र अवसरवादिता ही है । न्यायवादी व्यवहार से आवश्यकता से अधिक उत्पादन व समाज न्याय पोषक होना सिद्ध है । अवसरवादी व्यवहार में परधन, परनारी तथा परपीड़ा का समाविष्ट होना आवश्यक है, जिसके लिए अमानवीयतावादी मानसिकता, भाषा, प्रसारण,
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