• उपरिवर्णित सम्बन्ध एवम् सम्पर्क में तारतम्यात्मक व्यवहार पक्ष के आनुषंगिक मानव का, विभिन्न विभूतिपरक एवम् स्थितिपरक अध्ययन आवश्यक तथा वांछनीय है । अस्तु, सभी मानव आबाल-वृद्ध निम्न बारह स्थिति में गण्य है । ये सभी सुखी होना चाहते हैं । सुख भी नियम से, दुःख भी नियम से होना सिद्ध हुआ है । अतः निम्न बारह स्तर में पाये जाने वाले मानव किन नियमसिद्ध प्रक्रिया द्वारा सुखी होना पाए जाते हैं, उसका स्पष्टीकरण निम्नानुसार है - यह सब व्यवहार संबंध व सम्पर्कात्मक है -
  • 1. बलवान दयापूर्वक सुखी होता है,
  • 2. बुद्धिमान विवेक तथा विज्ञान पूर्वक,
  • 3. रूपवान सत् चरित्रता पूर्वक,
  • 4. पदवान न्याय पूर्वक,
  • 5. धनवान उदारता पूर्वक,
  • 6. विद्यार्थी निष्ठा पूर्वक,
  • 7. सहयोगी कर्त्तव्य पूर्वक
  • 8. साथी दायित्व पूर्वक
  • 9. तपस्वी संतोष पूर्वक,
  • 10. लोक सेवक स्नेह पूर्वक,
  • 11. सहअस्तित्व में प्रेम पूर्वक मानव सुखी होता है ।
  • 12. रोगी तथा बालक के साथ आज्ञा पालन के रूप में सुखानुभूतियाँ सिद्ध हुई हैं ।
  • # धर्मनीति के परिपालन से समस्त सम्पर्कात्मक तथा सम्बन्धात्मक व्यवहार में क्या अपेक्षा की जाती है, जिससे कि जीवन सफल होता है नीचे दर्शाया गया है । ऐसी धर्मनैतिक व्यवस्था तथा इसके लिए किया गया समस्त व्यवहार, प्रयोग तथा प्रयास अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था का पोषक है ।
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