रूप से पाँच मुद्दे पाये गये हैं । यह - (1) मानवीय शिक्षा-संस्कार (2) न्याय-सुरक्षा (3) उत्पादन-कार्य (4) विनिमय-कोष (5) स्वास्थ्य-सयंम के रूप में गण्य हैं ।
- ⁕ राज्य प्रक्रिया में उक्त पाँचों व्यवस्थाएं सार्वभौमिकता के अर्थ में ही सार्थक होना पाया जाता है । मानवीय शिक्षा-संस्कार की सफलता अर्थ बोध होने के रूप में है । न्याय-सुरक्षा की सफलता संबंधों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह, मूल्यांकन पूर्वक उभय तृप्ति के रूप में सार्थक होना पाया जाता है । उत्पादन-कार्य हर परिवार की आवश्यकता से अधिक उत्पादन के रूप में, समृद्धि के अर्थ में सार्थक होना पाया जाता है । विनिमय-कोष श्रम मूल्य के पहचान सहित, श्रम विनिमय पद्धति से सार्थक होता है । और स्वास्थ्य-संयम मानव परंपरा में जीवन जागृति को प्रमाणित करने योग्य शरीर की स्थिति-गति के रूप में सार्थक होता है । यह सब मानव सहज जागृति के अक्षुण्णता का द्योतक है अथवा सार्वभौम व्यवस्था, अखंड समाज और उसकी अक्षुण्णता का द्योतक है । यही राज्य वैभव का स्वरूप है । इस विधि से हर परिवार समाधान-समृद्धि पूर्वक जीना होता है ।
- ● यदि समस्या है तो समाधान है ही । समाधान के आधार पर निश्चितता को पाना अनिवार्य है ।
- ● कोई भी मानव अनिश्चित विधि व व्यवस्था नहीं चाहता । विधि एवम् व्यवस्था के प्रति विश्वास एवम् निष्ठा की निरन्तरता के लिये सार्वभौम विधि व्यवस्था आवश्यक है ।
- # इसके पूर्व में न्यायवादी व अवसरवादी व्यवहार का विश्लेषण किया जा चुका है । अवसरवादी नीति से अनिश्चित दिशा, गति एवम् घटना ही सम्भव है, जिससे व्यवस्था में स्थिरता तथा विश्वास नहीं उत्पन्न कराया जा सकता । साथ ही यह भी स्पष्ट किया जा चुका है कि न्यायवादी नीति के विकास तथा व्यवहारान्वयन के लिये मानवीयता ही आधार है ।
- # विधि का लक्ष्य है, निषेध पर विजय (समाधान) और व्यवस्था का लक्ष्य है विधि का पालन एवं संवर्धन । उपरोक्तानुसार निर्णीत विधि से मानवीयता की विजय होता है तथा ऐसी विधि के लिये दी गई व्यवस्था का लक्ष्य मानवीयता का संरक्षण एवम्