संवर्धन ही है । इस प्रकार मानवीयता पूर्ण परंपरा विधि व व्यवस्था की उपलब्धि विश्वास है ।

  • विधि का मूल सूत्र मानवीयता पूर्ण आचरण ही है ।
  • मानव परम्परा में जागृत मानव ही शिक्षा प्रदान करने में समर्थ है । शिक्षा का प्रयोजन है, अखण्ड सामाजिकता का सूत्र एवम् व्याख्या समाधान, समृद्धि, अभय व सहअस्तित्व । इस विधि से समाज अखण्डता और सार्वभौमता के रूप में वैभवित होता है ।
  • उपरिवर्णित धर्मनैतिक तथा राज्य नैतिक व्यवस्था के लिए जो मानवीयतापूर्ण दृष्टि, स्वभाव तथा विषयों को व्यवहार में आचरित करने योग्य अवसर तथा साधन प्रस्तुत हो सके तथा रूचि उत्पन्न कर सके शिक्षा नीति है ।
  • # समस्त मानव समाज द्वारा बौद्धिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवम् प्राकृतिक क्षेत्र में ही विभिन्न कार्य सम्पादित किये जा रहे हैं । इन तीनों क्षेत्रों में किया गया कार्य ही मानव के लिए सम्पूर्ण व्यवहार कार्य है ।
  • राज्य-नीति का लक्ष्य तन, मन एवम् धन की सुरक्षा है तथा इसके लिए विधि तथा व्यवस्था प्रदान करना है । इस क्रम में यह जान लेना आवश्यक है कि बौद्धिक नियम की अवधारणाएँ ही क्रम से व्यवहार काल में प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक नियमों का अनुसरण करती हैं, जिससे जागृति या ह्रास सिद्ध होती है । यहाँ हम बौद्धिक, सांस्कृतिक तथा प्राकृतिक क्षेत्र में किए जा रहे व्यवहार के विधि व निषेध पक्ष का अध्ययन करेंगे ।
  • # सदुपयोगी राज्य-नीति के निर्धारण के लिए विधि व निषेध निम्नानुसार परिलक्षित होता है :-

बौद्धिक क्षेत्र

विधि (जागृत मानव प्रवृत्ति)

निषेध (भ्रमित मानव प्रवृत्ति)

  • असंग्रह (समृद्धि का प्रमाण, व्यय के लिए आय)
  • संग्रह (आय को व्यय से मुक्त करने का प्रयास)
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