- ● निश्चित क्रिया को निर्देश करने वाले शब्द की सार्थक और इसके विपरीत शब्द की निरर्थक संज्ञा है ।
- ● मौलिकता का निर्णय रूप, गुण, स्वभाव तथा धर्म के निरीक्षण, परीक्षण तथा सर्वेक्षण से एवं अध्ययन के द्वारा होता है ।
- ● आकार, आयतन एवं घनता से ‘रूप’ का; सम, विषम और मध्यस्थ के भेद से ‘गुण’ का; इकाई द्वारा गुण की उपयोगिता से ‘स्वभाव’ का निर्णय होता है ।
- # हर गुण की प्रयुक्ति केवल उद्भव, विभव या प्रलय में ही है । अत: हर इकाई का स्वभाव उद्भव वादी, विभव वादी या प्रलयवादी स्वभाव के प्रवृत्ति के रूप में प्रस्तुत है । यह क्रिया विकास या ह्रास के ओर ही है ।
- ● जो जिसकी धारणा है, वह उस इकाई का धर्म है ।
- # पदार्थावस्था का धर्म अस्तित्व; प्राणावस्था का धर्म अस्तित्व सहित पुष्टि; जीवावस्था का धर्म अस्तित्व, पुष्टि सहित जीने की आशा और ज्ञानावस्था का धर्म अस्तित्व, पुष्टि, जीने की आशा सहित सुख है ।
- ● धारणा की अनुकूल चेष्टा को स्फुरण अथवा क्रांति तथा इसकी प्रतिकूल चेष्टा की प्रतिक्रांति संज्ञा है । स्फुरण से समाधान तथा प्रतिक्रांति से समस्या है ।
- ● समाधान की ओर प्राप्त प्रेरणा की अनुकूल तथा समस्या की ओर प्राप्त विवशता की प्रतिकूल संज्ञा है ।
- ● आत्मा की प्रेरणा से संपन्न संकल्प, इच्छा, विचार और आशा स्व-सापेक्ष हैं, स्फुरण है ।
- ● चैतन्य पक्ष की एकसूत्रता के अभाव से उत्पन्न संकल्प के नाम से इच्छा, आशा एवं विचार पर-सापेक्ष है, जो प्रतिक्रांति हैं ।
- ● स्व-सापेक्षता में विश्राम तथा पर-सापेक्षता में (जड़ पक्ष के साथ आसक्ति में) श्रम का प्रसव है ।
- ⁘ श्रम :- मानव इकाई की आशा और उपलब्धि के बीच में ऋणात्मक स्थितियाँ ही श्रम हैं तथा धनात्मक स्थितियाँ ही समाधान हैं ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द