• # मानवीयता का अध्ययन अपेक्षाकृत रीति से तीन प्रकार से वर्णित किया जा चुका है, वह है- मानवीय स्वभाव, मानवीय दृष्टि एवं मानवीय विषय । इनके स्थापन, पोषण एवं वर्धन हेतु मानव को प्रयासरत रहना ही होगा ।
  • # मानवीयतापूर्ण समाज या व्यवस्था द्वारा, प्रत्येक संबंध एवं संपर्क का निर्वाह करते हुए, मानवीयता के संरक्षण के लिये किए गए समस्त अध्ययनात्मक प्रयास की संस्कार संज्ञा है तथा इसके आचरण, प्रचार और प्रदर्शन-पक्ष की संस्कृति संज्ञा है ।
  • संस्कृति का पोषण सभ्यता से, सभ्यता का पोषण विधि (मानवीय आचार संहिता) से, विधि का पोषण व्यवस्था से, आचरण का पोषण संस्कृति से है, जो अन्योन्याश्रित व संबंधित है ।
  • मानव समाज के गठन का मूल उद्देश्य भय मुक्त होना तथा जागृत होना रहना है ।
  • मानव के लिए समस्त भय के तीन ही कारण परिलक्षित होते हैं :-

(1) प्राकृतिक भय

(2) पाशविक भय

(3) मानव में निहित अमानवीयता का भय ।

  • विकास व ह्रास भेद से अवस्था, अवस्था भेद से आशा, आशा भेद से आकर्षण-प्रति आकर्षण, आकर्षण-प्रत्याकर्षण भेद से आसक्ति, आसक्ति भेद से विवशता, विवशता भेद से संवेग, संवेग भेद से कर्म, कर्म भेद से फल, फल भेद से समस्या एवं समाधान, समस्या एवं समाधान भेद से ही ह्रास-विकास-जागृति सहज गतियाँ हैं, जिससे मानवीयता, अमानवीयता एवं अतिमानवीयता का प्रादुर्भाव प्रमाण है ।
  • मानव की जागृति बौद्धिक समाधान एवं भौतिक समृद्धि के लिए ही है ।
  • बौद्धिक समाधान तथा भौतिक समृद्धि की पुष्टि के लिए स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण भेद से दर्शन है ।
  • शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गंध की जानकारी को स्थूल मन, वृत्ति, चित्त एवं सापेक्ष शक्तियों की जानकारी को सूक्ष्म समझ और निरपेक्ष शक्ति एवं उसको अनुभव करने वाली आत्मा और बोध करने वाली बुद्धि की समझ को कारणात्मक समझ की संज्ञा है ।
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