(1) प्रियाप्रिय, (2) हिताहित, (3) लाभालाभ, (4) न्यायान्याय, (5) धर्माधर्म और (6) सत्यासत्य ।

  • सुखाकाँक्षा से आशय, आशय से आवश्यकता, आवश्यकता से अध्ययन, अध्ययन से क्षमता, क्षमता से दृष्टि, दृष्टि से दर्शन तथा दर्शन से स्पष्टीकरण तथा स्पष्टीकरण से निश्चित योजना है ।
  • मानव में अर्थ तथा काम के प्रलोभन से ही प्रियाप्रिय, हिताहित तथा लाभालाभ दृष्टियाँ क्रियाशील है, साथ ही धर्म तथा मोक्ष के संकल्पों से न्यायान्याय, धर्माधर्म तथा सत्यासत्य दृष्टियाँ क्रियाशील हैं । भ्रम मुक्ति ही मोक्ष है ।
  • मानवीयता तथा अतिमानवीयता से समृद्ध होने के लिए मोक्ष व धर्म के प्रति इच्छा एवं जिज्ञासा होना आवश्यक है ।
  • भ्रमवश सुविधा-संग्रह प्राप्ति के लिए की गई प्रारंभिक तैयारी ही प्रलोभन है । सार्थक प्राप्ति के सम्भावनात्मक विचारों की आशय, जिसकी उपलब्धि के बिना तृप्ति सम्भव न हो उसे आवश्यकता संज्ञा है ।
  • अधिष्ठान (आत्मा) एवं अनुभव की साक्षी में स्मरणपूर्वक किए गए क्रिया, प्रक्रिया एवं प्रयास को अध्ययन संज्ञा है जो जितने पात्रता से सम्पन्न है, वह उसकी अर्हता, अर्हता द्वारा की गयी रीति को दृष्टि और दृष्टि द्वारा प्राप्त प्रतिबिंबन क्रिया की दर्शन संज्ञा है ।
  • क्रिया मात्र ही दृश्य है जिसकी लोक संज्ञा है । दृश्य का दर्शन तथा अदृश्य (व्यापकता) सहज अनुभव प्रसिद्ध है ।
  • सहअस्तित्व ही सम्पूर्ण दृश्य है ।
  • व्यापक वस्तु में सम्पृक्त जड़-चैतन्य प्रकृति सहज अनुभव ही ज्ञानावस्था की इकाई के पूर्ण जागृति का द्योतक है ।
  • लोक तृष्णा से त्रस्त एवम् इसमें व्यस्त समस्त प्रयत्नों में मानव को श्रम की पीड़ा ही है । इसीलिये मानव ने श्रम की पीड़ा से मुक्त होने का यत्न भी किया है, जो मानव की क्षमता, योग्यता एवम् पात्रता के अनुसार सफल अथवा असफल हुआ है ।
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