• मानव ने अमानवीयता की समीक्षा तथा मानवीयता और अतिमानवीयता का अध्ययन करने का प्रयास किया है । उपरोक्त तीनों दृष्टि, स्वभाव एवम् विषय का वर्णन पूर्व में किया जा चुका है ।
  • शून्य (व्यापक) ही ज्ञान है । व्यापक ही सत्ता है । व्यापक सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति सहज आचरण ही नियम है जिसको अस्तित्व में पाया जाता है ।
  • हर क्रिया नियम से नियन्त्रित है ।
  • विषयी, विषय तथा विषय-वस्तु यह तीनों क्रियाएँ हैं ।
  • जड़ क्रिया को पाकर किए गए श्रम से, विश्राम की प्रतीक्षा एवम् प्रयास मानव ने किया है, जो असफल सिद्ध हुआ है । इसके साथ ही व्यवहारिक एवम् वैचारिक एकसूत्रता पूर्वक सहअस्तित्व भी सिद्ध हुआ है, जो नियम एवम् व्यापकता सहज महिमा है ।
  • समस्त क्रियाएं सत्ता में नियन्त्रित तथा संरक्षित है । क्योंकि इकाई और इकाई के बीच सत्ता का अभाव नहीं है । इसलिये सत्ता ही नियम एवम् नियंत्रण का कारण सिद्ध हुआ है । इसी के भास, आभास प्रतीति एवम् अनुभूति के योग्य क्षमता, योग्यता एवम् पात्रता से सम्पन्न होने के लिए ही मानव ने अनवरत प्रयास विभिन्न स्तरों पर किया है, कर रहा है और करता रहेगा ।
  • उक्त प्रयास के मूल में क्षमता; क्षमता के मूल में अध्ययन; अध्ययन के मूल में पात्रता; पात्रता के मूल में योग्यता; योग्यता के मूल में शास्त्राभ्यास, व्यवहाराभ्यास, कर्माभ्यास; अभ्यास के मूल में साधन; साधन के मूल में एकसूत्रता; एकसूत्रता के मूल में प्रयास हर मानव इकाई में अपनी-अपनी अवस्था और जागृति अनुसार होना पाया जाता है ।
  • परस्पर समाधान के अर्थ में जीवन क्रिया व संकेत ग्रहण सहित अनुसरण क्रिया ही ‘एकसूत्रता’ है ।
  • स्पष्टतापूर्वक प्रसारित संकेतानुसरण से ही एकसूत्रता व जागृति है, अन्यथा भ्रम व ह्रास है।
  • भ्रमित व्यक्ति के द्वारा, भ्रमित व्यक्ति को संबोधन एवं अमानवीय शिक्षापूर्वक जागृति को प्रमाणित करना संभव नहीं है । जागृत व्यक्ति के द्वारा ही भ्रमित व्यक्ति को जागृति के लिए मार्ग प्रशस्त करना प्रमाणित होता है और यही स्वयं में जागृति का प्रमाण है ।
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